तेरी आज़ादी – शशि कुमार आँसू

क्या पा ली तेरी तूने आज़ादी!
क्या छिन के ली तूने आज़ादी?

तय तो करो कैसी हो आज़ादी!
किस बात की चाहिए आज़ादी?

क्या ख़ुद की बंदगी से आज़ादी !
या मन की गंदगी से आज़ादी !!

क्या बेसुमार नफरतों से आज़ादी !
या दकियानूसी सोचों से आजादी!!

क्या तेरी झूठे वादों से आज़ादी !
या तेरी टुच्ची इरादों से आज़ादी !!

क्या तेरी कर्तव्यहीनता से आज़ादी !
या तेरी बेसुमार कृतघ्नता से आज़ादी !!

क्या तेरी अनुशासनहीनता से आज़ादी!
या तेरी कोरी कपट बहानो से आज़ादी!!

क्या राह मे बिछी बाधाओं से आज़ादी !
या मेहनतकश आशाओं से आज़ादी !!

क्या पतंग का अपने डोर से आज़ादी!
या उसके बाधाओं के छोर से आजादी!!

कहते हो छिन के लेंगे मेरी आज़ादी?
कहो क्या पा ली ये सब से आज़ादी!!

लेखक – शशि कुमार आँसू @shashiaansoo

घर की याद – भवानी प्रसाद मिश्र

आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,
रात-भर गिरता रहा है,
प्राण मन घिरता रहा है,

अब सवेरा हो गया है,
कब सवेरा हो गया है,
ठीक से मैंने न जाना,
बहुत सोकर सिर्फ़ माना—

क्योंकि बादल की अँधेरी,
है अभी तक भी घनेरी,
अभी तक चुपचाप है सब,
रातवाली छाप है सब,

गिर रहा पानी झरा-झर,
हिल रहे पत्ते हरा-हर,
बह रही है हवा सर-सर,
काँपते हैं प्राण थर-थर,

बहुत पानी गिर रहा है,
घर नज़र में तिर रहा है,
घर कि मुझसे दूर है जो,
घर ख़ुशी का पूर है जो,

घर कि घर में चार भाई,
मायके में बहिन आई,
बहिन आई बाप के घर,
हायर रे परिताप के घर!

आज का दिन दिन नहीं है,
क्योंकि इसका छिन नहीं है,
एक छिन सौ बरस है रे,
हाय कैसा तरस है रे,

घर कि घर में सब जुड़े हैं,
सब कि इतने तब जुड़े हैं,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,

और माँ बिन-पढ़ी मेरी,
दुःख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर,

माँ कि जिसकी स्नेह-धारा
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता।

और पानी गिर रहा है,
घर चतुर्दिक् घिर रहा है,
पिताजी भोले बहादुर,
वज्र-भुज नवनीत-सा उर,

पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी दौड़ जाएँ,
जो अभी भी खिल-खिलाएँ,

मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें,
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता,

आज गीता पाठ करके,
दंड दो सौ साठ करके,
ख़ूब मुगदर हिला लेकर,
मूठ उनकी मिला लेकर,

जब कि नीचे आए होंगे
नैन जल से छाए होंगे,
हाय, पानी गिर रहा है,
घर नज़र में तिर रहा है,

चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे,
नज़र उनकी पड़े होंगे।

पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवें का नाम लेकर,

पाँचवाँ मैं हूँ अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,
पिताजी कहते रहे हैं,
प्यार में बहते रहे हैं,

आज उनके स्वर्ण बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेटे,
क्योंकि मैं उन पर सुहागा
बँधा बैठा हूँ अभागा,

और माँ ने कहा होगा,
दुःख कितना बहा होगा
आँख में किस लिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी,

वह तुम्हारा मन समझ कर,
और अपनापन समझ कर,
गया है सो ठीक ही है,
यह तुम्हारी लीक ही है,

पाँव जो पीछे हटाता,
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेगे और बच्चे,

पिताजी ने कहा होगा,
हाय कितना सहा होगा,
कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,
धीर मैं खोता, कहाँ हूँ,

गिर रहा है आज पानी,
याद आता है भवानी,
उसे थी बरसात प्यारी,
रात-दिन की झड़ी झारी,

खुले सिर नंगे बदन वह,
घूमता फिरता मगन वह,
बड़े बाड़े में कि जाता,
बीज लौकी का लगाता,

तुझे बतलाता कि बेला
ने फलानी फूल झेला,
तू कि उसके साथ जाती,
आज इससे याद आती,

मैं न रोऊँगा,—कहा होगा,
और फिर पानी बहा होगा,
दृश्य उसके बाद का रे,
पाँचवे की याद का रे,
भाई पागल, बहिन पागल,
और अम्मा ठीक बादल,
और भौजी और सरला,,
सहज पानी, सहज तरला,

शर्म से रो भी न पाएँ,
ख़ूब भीतर छटपटाएँ,
आज ऐसा कुछ हुआ होगा,
आज सबका मन चुआ होगा।

अभी पानी थम गया है,
मन निहायत नम गया है,
एक-से बादल जमे हैं,
गगन-भर फैले रमे हैं,

ढेर है उनका, न फाँकें,
जो कि किरने झुकें-झाँकें,
लग रहे हैं वे मुझे यों,
माँ कि आँगन लीप दे ज्यों,

गगन-आँगन की लुनाई,
दिशा के मन से समाई,
दश-दिशा चुपचार है रे,
स्वस्थ की छाप है रे,

झाड़ आँखें बंद करके,
साँस सुस्थिर मंद करके,
हिले बिन चुपके खड़े हैं,
क्षितिज पर जैसे जड़े हैं,

एक पंछी बोलता है,
घाव उर के खोलता है,
आदमी के उर बिचारे,
किस लिए इतनी तृषा रे,

तू ज़रा-सा दुःख कितना,
सह सकेगा क्या कि इतना,
और इस पर बस नहीं है,
बस बिना कुछ रस नहीं है,

हवा आई उड़ चला तू,
लहर आई मुड़ चला तू,
लगा झटका टूट बैठा,
गिरा नीचे फूट बैठा,

तू कि प्रिय से दूर होकर,
बह चला रे पूर होकर
दुःख भर क्या पास तेरे,
अश्रु सिंचित हास तेरे!

पिताजी का वेश मुझको,
दे रहा है क्लेश मुझको,
देह एक पहाड़ जैसे,
मन कि बड़ का झाड़ जैसे

एक पत्ता टूट जाए,
बस कि धारा फूट जाए,
एक हल्की चोट लग ले,
दूध की नद्दी उमग ले,

एक टहनी कम न होले,
कम कहाँ कि ख़म न होले,
ध्यान कितना फ़िक्र कितनी,
डाल जितनी जड़ें उतनी!
इस तरह का हाल उनका,

इस तरह का ख़याल उनका,
हवा, उनको धीर देना,
यह नहीं जी चीर देना,
हे सजीले हरे सावन,

हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें,

मैं मज़े में हूँ सही है,
घर नहीं हूँ बस यही है,
किंतु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है,

किंतु उससे यह न कहना,
उन्हें देते धीर रहना,
उन्हें कहना लिख रहा हूँ,
मत करो कुछ शोक कहना,

और कहना मस्त हूँ मैं,
कातने में व्यस्त हूँ मैं,
वज़न सत्तर सेर मेरा,
और भोजन ढेर मेरा,

कूदता हूँ, खेलता हूँ,
दुःख डट कर ठेलता हूँ,
और कहना मस्त हूँ मैं,
यों न कहना अस्त हूँ मैं,

हाय रे, ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूँ,
आदमी से भागता हूँ,

कह न देना मौन हूँ मैं,
ख़ुद न समझूँ कौन हूँ मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना,

हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें।

स्रोत:
पुस्तक : मन एक मैली क़मीज़ है (पृष्ठ 25)संपादक : नंदकिशोर आचार्यरचनाकार : भवानी प्रसाद मिश्रप्रकाशन : वाग्देवी प्रकाशनसंस्करण : 1998

ख़ैरात की दुश्मनी – शशि कुमार आँसू

भई दुश्मन बनाने के लिए ज़रूरी नही की हर वक़्त लड़ा जाए,
ये काम आप थोड़े कामयाब होके  ख़ैरात में भी पा सकते हैं।

बदचलन होना लाजमी है – शशि कुमार आँसू

थोड़ा तो बदचलन होना लाजमी है मेरे यार
भस्मासुर बहुत हैं! बिन कहे लाज़ लूट लेते हैं।।

थोड़ा तो बदचलन होना लाजमी है मेरे यार
भस्मासुर बहुत हैं! बिन कहे लाज़ लूट लेते हैं।।
©शशि कुमार आँसू
#SKA


तेरा ख्याल – शशि कुमार आँसू

तेरा जब भी ख्याल आता है…
ख़ुद के नशे में महुए सा टपक जाता हूँ।
अक्खड़ प्रेमी सा चलता हूँ… लड़खड़ाता हूँ।

तेरा जब भी ख्याल आता है…
सुर्ख उढ़हूल सा लहलहा के खिल जाता हूँ।
मोगरे की खुशबू सा फिज़ा मे बिखर जाता हूँ।

तेरा जब भी ख्याल आता है…
सुनसान मेरे बस्ती मे गाता हूँ गुनगुनाता हूँ।
भीगी बारिश मे मोरनी सा चहचहाता हूँ।

तेरा जब भी ख्याल आता है…
खुले आसमान मे सैर पर चला जाता हूँ।
चाँद को देखता हूँ मंद मंद मुस्कुराता हूँ।

तेरा जब भी ख्याल आता है…
तेरी असीम यादों मे गुम हो जाया करता हूँ।
थोड़ा ठहरता हूँ फिर गुमसुम हो जाता हूँ।

तेरा जब भी ख्याल आता है…
मैं बस टूटता हूँ, बिखरता हूँ, छटपटाता हूँ…
तेरी यादों मे मैं तुझे हीं ओढ़ता बिछाता हूँ।

तेरा जब भी ख्याल आता है…
तेरे एहसास से हीं आह्लादित हो जाता हूँ
खुशबू में तेरी डूब प्रेम की पराकाष्ठा मैं पाता हूँ।

लेखक :: शशि कुमार आँसू @shashiaansoo


Share Your Happiness : न जाने कल हो न हो!

Happiness is real when it’s shared with whom we are being cared…

शायद हम अटक कर रह जाते है हरदम दुसरो को गलत सिद्ध करने में समय व्यतित कर देते है और समय कब दगा दे जाता है पता नही चलता!!

चलो सबको माफ करो! खुशी के पल को जी भर के जियो! साथ होने का अहसास का आनंद लो। ख़ुद को टेक्नोलॉजी पर ज्यादा कंज़्यूम मत करो… अड़चनों से थोड़ा आगे बढ़ो!

न जाने कल हो न हो!

Fight In The Arena – Shashi Kumar Aansoo

You Must Not allow people to mistune your emotions & poison the day with their words. Some People find opportunity to dash You Therefore You need to have patience. Bring Stability, permanence (ठहराव) in your Karma. Don’t let impatience mind govern your decisions & actions. Impatience behavior gives nothing except pang of guilt. Keep yourself calm & ambitious enough to fight with all petty things.

When you are #ambitious you automatically busy & when you busy you automatically respectful for other person & profession . Critics are the least ambitious one who avoid failure doing nothing but criticizing others. Here the man only matters who fought in the arena.

Be the man of arena. keep rejuvenating yourself. Learn & Rise

#Respectful #सत्यवचन #ShashiKumarAansoo #BlogPost #Mytruth #monologue #MySpeak # Speaking Shashi #मेरी बात

एक परी दूर जगत की

आते जाते सुना था सबसे
एक परी वो दूर जगत से

बैठ के आयी एक किश्ती में
दूर जहां से एक बस्ती में

मिलेगी मुझसे कब वो डर है
थोड़ा दूर यहां से उसका घर है

चलो तो उसको ढूंढ़ कर लाएं
आरज़ू दिल की सब कह सुनाएं।।

मैं जो हूँ :भवानी प्रसाद मिश्र की कविता

मैं जो हूँ
मुझे वही रहना चाहिए
यानी
वन का वृक्ष
खेत की मेड़
नदी की लहर
दूर का गीत
व्यतीत
वर्तमान में
उपस्थित भविष्य में
मैं जो हूँ मुझे वही रहना चाहिए
तेज़ गर्मी
मूसलाधार वर्षा
कड़ाके की सर्दी
ख़ून की लाली
दूब का हरापन
फूल की जर्दी
मैं जो हूँ
मुझे अपना होना
ठीक ठीक सहना चाहिए
तपना चाहिए
अगर लोहा हूँ
हल बनने के लिए
बीज हूँ
तो गड़ना चाहिए
फल बनने के लिए
मैं जो हूँ
मुझे वह बनना चाहिए
धारा हूँ अंत:सलिला
तो मुझे कुएँ के रूप में
खनना चाहिए
ठीक ज़रूरतमंद हाथों से
गान फैलाना चाहिए मुझे
अगर मैं आसमान हूँ
मगर मैं
कब से ऐसा नहीं
कर रहा हूँ
जो हूँ
वही होने से डर रहा हूँ।

सखि, वे मुझसे कहकर जाते (यशोधरा)

सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?

मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना ?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते ।

सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को, प्राणों के पण में,
हमीं भेज देती हैं रण में –
क्षात्र-धर्म के नाते ।

सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

हु‌आ न यह भी भाग्य अभागा,
किसपर विफल गर्व अब जागा ?
जिसने अपनाया था, त्यागा;
रहे स्मरण ही आते !

सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
पर इनसे जो आँसू बहते,
सदय हृदय वे कैसे सहते ?
गये तरस ही खाते !

सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

जायें, सिद्धि पावें वे सुख से,
दुखी न हों इस जन के दु:ख से,
उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से ?
आज अधिक वे भाते !

सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

गये, लौट भी वे आवेंगे,
कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे,
रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
पर क्या गाते-गाते ?

सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

मैथिलीशरण गुप्त

नचिकेता की कहानी : दुनिया का पहला जिज्ञासु

कठ उपनिषद में नचिकेता को सबसे पहला साधक बताया गया है। नचिकेता मृत्यु का भेद जानने के लिए यम के द्वार तक पहुंच गया था। जानते हैं नचिकेता के प्रश्न और यम के उत्तर के बारे में

नचिकेता के पिता का यज्ञ
नचिकेता को दुनिया का पहला जिज्ञासु माना जाता है – कम से कम पहला महत्वपूर्ण जिज्ञासु। एक उपनिषद् भी उस से शुरू होता है। नचिकेता एक छोटा बालक था। उसके पिता ने एक यज्ञ करने की शपथ ली थी। यह एक ऐसा पवित्र अनुष्ठान था, जिसमें उन्हें अपनी सारी सांसारिक संपत्ति – अपना घर, अपना सारा सामान, यहां तक कि अपनी पत्नी, अपने बच्चे, यानी अपना सब कुछ ऋषियों, ब्राह्मणों और दूसरे लोगों को दान में दे देना था। इस तरह के यज्ञ से आप आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करते हैं। यह एक ऐसा साधन है, जिसे पारंपरिक रूप से रचा गया है।

नचिकेता के पिता ने बेकार की चीज़ें दान कर दीं
कुछ लोग आध्यात्मिक ज्ञान के लिए इस तरह का शपथ लेते हैं। नचिकेता के पिता ने यह शपथ ली और और उन्होंने अपनी सभी बीमार गायें, बेकार संपत्ति और जिन चीजों की उन्हें जरूरत नहीं थी, जो किसी न किसी रूप में उनके लिए बोझ थीं, वे सब दान में दे डालीं। उन्होंने खूब दिखावा किया मगर जिन चीजों की उन्हें वाकई जरूरत थी, जैसे अपनी दोनों पत्नियों और बच्चे को, उनको उन्होंने अपने पास ही रखा। नचिकेता को यह सब देखकर बहुत दुख हुआ। उसने देखा कि उसके पिता ने ईमानदारी नहीं दिखाई। उसके पिता ने शपथ ली थी कि वह सब कुछ दान करके आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करेंगे, मगर उन्होंने चालाकी की। नचिकेता अपने पिता के पास गया और इस बारे में उनसे बात करने लगा। उसकी उम्र उस समय सिर्फ पांच साल की थी, मगर उसमें असाधारण समझदारी थी।

नचिकेता ने अपने पिता को समझाना चाहा
नचिकेता ने अपने पिता से कहा, ‘आपने ठीक नहीं किया। अगर आप सब कुछ देना नहीं चाहते थे, तो आपको यह शपथ नहीं लेनी चाहिए थी। एक बार शपथ लेने के बाद, आपको सब कुछ दे देना चाहिए। मुझे बताइए कि आप मुझे किसको दान करने वाले हैं?’ उसके पिता क्रोधित हो गए और बोले, ‘मैं तुम्हें यम को देने वाला हूं।’ यम मृत्यु के देवता होते हैं। बालक ने अपने पिता की बात को बहुत गंभीरता से लिया और यम के पास जाने के लिए तैयार होने लगा। फिर वह यम के पास चला गया। यह मत सोचिए कि ‘वह कैसे गया होगा, शरीर के साथ या शरीर छोड़कर?’ मुद्दा यह नहीं है। बस वह यम के पास चला गया।

यम की प्रतीक्षा में नचिकेता ने बिताए तीन दिन
यम उस समय यमलोक में नहीं थे। वह घूमने गए हुए थे। उन्हें घर-घर जाना पड़ता है। तो वह घूमने गए हुए थे। नचिकेता पूरे तीन दिन तक इंतजार करता रहा। एक छोटा सा बालक भोजन-पानी के बिना यम के द्वार पर इंतजार करता रहा। तीन दिन बाद यम लौटे तो उन्होंने पूरी तरह थके और भूखे, मगर पक्के इरादे वाले इस छोटे से बालक को देखा। वह बिना हिले-डुले वहां बैठा हुआ था। वह भोजन की तलाश में इधर-उधर भी नहीं गया था। वह बस वहां बैठकर यम की प्रतीक्षा कर रहा था। यम इस बालक के पक्के इरादे से बहुत प्रभावित हुए, जो तीन दिन से प्रतीक्षा कर रहा था, वह भी बिना कुछ ग्रहण किए। वह बोले, ‘मुझे यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि तुम तीन दिन से मेरा इंतजार कर रहे हो। तुम्हें क्या चाहिए? मैं तुम्हें तीन वरदान देता हूं। बताओ, तुम क्या चाहते हो?’

नचिकेता ने पूछा मृत्यु के रहस्य के बारे में
नचिकेता ने सबसे पहले कहा, ‘मेरे पिता बहुत लालची हैं। वह सांसारिक सुख-सुविधाएं चाहते हैं। इसलिए आप उन्हें सारे भौतिक ऐशोआराम का आशीर्वाद दें। उन्हें राजा बना दीजिए।’ यम ने कहा ‘तथास्तु’। उसने दूसरा वरदान मांगा, ‘मैं जानना चाहता हूं कि मुझे ज्ञान प्राप्त करने के लिए किस तरह के कर्मों और यज्ञों को करने की जरूरत है।’ वैदिक साहित्य में हमेशा यज्ञों की बात की जाती है। सारा वैदिक साहित्य ऐसा ही है – यज्ञों के बारे में। यम ने उसे सिखाया कि उसे क्या करना चाहिए।
फिर नचिकेता ने उनसे पूछा, ‘मृत्यु का रहस्य क्या है? मृत्यु के बाद क्या होता है?’ यम ने कहा, ‘यह प्रश्न तुम वापस ले लो। तुम मुझसे और कुछ भी मांग लो। तुम चाहो तो मुझसे एक राज्य मांग लो, मैं तुम्हें दे दूंगा। मैं तुम्हें धन-दौलत दे सकता हूं। मैं तुम्हें दुनिया के सारे सुख दे सकता हूं।’ वह बोलते रहे, ‘तुम मुझे बताओ, क्या चाहते हो। तुम मुझसे दुनिया की सारी खुशियां ले लो, मगर यह प्रश्न मत पूछो।’ नचिकेता ने कहा, ‘इन सब का मैं क्या करूंगा? आप पहले ही मुझे बता चुके हैं कि ये सब चीजें नश्वर हैं। मैं पहले ही समझ चुका हूं कि सारे क्रियाकलाप, लोग जिन चीजों में सं लिप्त हैं, वे सब अर्थहीन हैं। वह सिर्फ दिखता है, वह हकीकत नहीं है। फिर मुझे और धन-दौलत देने का क्या लाभ? वह तो मेरे लिए सिर्फ एक जाल होगा। मैं कुछ नहीं चाहता, आप बस मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए।’

नचिकेता को हुई परम ज्ञान की प्राप्ति
यम ने इस सवाल को टालने की हर संभव कोशिश की। वह बोले, ‘देवता भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं जानते। मैं तुम्हें नहीं बता सकता।’ नचिकेता ने कहा, ‘अगर ऐसा है, अगर देवता भी इसका उत्तर नहीं जानते और सिर्फ आप जानते हैं, तब तो आपको इसका उत्तर देना ही होगा।’
उसने अपनी जिद नहीं छोड़ी। यम एक बार फिर उसे वहीं छोड़कर महीनों के लिए घूमने चले गए। वह किसी तरह सिर्फ इस बालक से पीछा छुड़ाना चाहते थे। मगर बालक कई महीनों तक वहीं डटा रहा। कहा जाता है कि यम के द्वार पर ही उसे पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हुई। उसे अस्तित्व के सारे प्रश्नों के जवाब मिल गए और उसने खुद को विलीन कर दिया। वह प्रथम जिज्ञासु था। इसलिए हमेशा उसे एक आदर्श की तरह प्रस्तुत किया जाता है। उस तरह का पक्का इरादा रखने वाला पांच साल का बालक, जो चॉकलेट या डिजनीलैंड की यात्रा जैसे लालच में नहीं पड़ा। वह सिर्फ ज्ञान चाहता था

ज्ञान पाने की प्रबल इच्छा का महत्व
इस तरह के व्यक्ति के लिए किसी तरह के मार्ग की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि मंजिल यहीं है, वेलंगिरि पहाड़ियों की चोटी पर नहीं है। जब मंजिल यहां नहीं होती, तब वह वेलंगिरि पहाड़ियों पर होती है और हमें धीरे-धीरे उन पर चढ़ना पड़ता है। जब आप नचिकेता की तरह होते हैं, तो आपको किसी मार्ग की जरूरत नहीं होती। सब कुछ यहीं मिल जाता है। कहीं जाने की जरूरत नहीं होती। यहां हम जो कुछ कर रहे हैं, इसका पूरा मकसद उस तीव्रता को पैदा करना है। इच्छा को इतना प्रबल और शक्तिशाली होना चाहिए कि ईश्वर आपसे दूर न रह सके और दिव्यता आपको नजरअंदाज न कर पाए। ऐसा नहीं है कि दिव्यता आपको नजरअंदाज करने की कोशिश करता है, मगर आपका मन और अहं लाखों अलग-अलग तरीकों से वास्तविकता पर पर्दा डाल कर उसे आपकी आंखों से ओझल करने की कोशिश करते हैं।

आपकी तीव्रता ही आपको रूपांतरित करती है
चाहे आप कर्म के पथ पर चलें या ज्ञान, क्रिया या भक्ति के पथ पर, आपकी तीव्रता ही आपको इन रास्तों पर आपको आगे बढ़ाती है, न कि खुद ये रास्ते। अगर तीव्रता न हो, तो कोई क्रिया कुछ नहीं कर सकती। जब तीव्रता इन क्रियाओं में आ जाती है, तो उनमें आपको एक अलग आयाम तक ले जाने की शक्ति होती है।
यानी यह क्रिया नहीं है जो आपको रूपांतरित करती है, बल्कि आपकी तीव्रता आपको रूपांतरित करती है। जब आपमें ये तीव्रता होती है, तो क्रिया एक जबरदस्त सहारा है जो उस तीव्रता को और बढ़ता है। क्रियाओं का सारा मकसद यही है। चाहे आप किसी भी मार्ग पर भी चलें, पथ का अनुसरण आपको कोई ज्ञान प्राप्त नहीं करा सकता, जब तक कि आपके अंदर वह तीव्रता न हो।

सौ फीसदी या बिल्कुल नहीं
अगर आप आधे दिल से किसी से प्रेम करते हैं, तो वह प्रेम नहीं है। प्रेम या तो सौ फीसदी होता है या बिल्कुल नहीं। अगर आपको लगता है कि आप किसी से 99 फीसदी प्रेम कर सकते हैं, तो आपने प्रेम को जाना ही नहीं है। किसी भी तरह के क्रियाकलाप पर यही बात लागू होती है। अगर आप कोई कार्य सौ फीसदी नहीं करते, तो उसका कोई मतलब नहीं है। उसका कोई अच्छा नतीजा नहीं निकलेगा।। ज्यादा से ज्यादा वह आपका पेट भर सकता है। जब तक कि आप कोई काम सौ फीसदी न करें, वह आपको रूपांतरित नहीं कर सकता। जब तक कि आपका प्रेम सौ फीसदी न हो, वह आपको रूपांतरित नहीं कर सकता। वह लेन-देन की तरह कुछ पाने का एक जरिया हो सकता है, मगर अस्तित्व के अर्थों में उसका कोई मूल्य नहीं है।

सद्‌गुरु जग्गी वासुदेव

साभार : https://hindi.speakingtree.in/

अभी भी जिंदा हूँ – शशि कुमार आँसू

माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।
पर देख ये सब शर्मिंदा हूँ।।

कहने को बहुत प्रोग्रेसिव हूँ
पर सच में बहुत निगेटिव हूँ।
जब देखता हूँ तेरे आँगन को
मन हीं मन बहुत घबराता हूँ।

कोविड से लड़ते सब दुःख सहते,
पथरीले पथ पर अविरल चलते
माँ को ढोते निढाल सपनों को

देख ये सब बहुत शर्मिंदा हूँ।
माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।

कुछ निखट निपोरे प्रयत्नों को
देख कर सियासी सब यत्नो को
सड़क पर चलते धुप में जलते
हालत के मारे हम वतनों को

देख ये सब बहुत शर्मिंदा हूँ।
माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।

ये नुका छिपी और दाव पेंच मे
तिल-तिल कर मरते तेरे रत्नों को
सह और मात के खुराफात मे
गर्त में डूबते का सब संयंत्रो को

देख ये सब बहुत शर्मिंदा हूँ।
माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।

भूखे मदद की गुहार लगाते
सियासत दनों के ताल पर नचते
अपनी कल की राह को तकते
आशाओं का बस एक पुलिंदा हूँ

माँ देख अभी भी जिंदा हूँ।
माँ देख अभी भी जिंदा हूँ।।

©शशि कुमार ‘आँसू’

https://images.app.goo.gl/R4xDtsJrpxbUYT8r7
The 21-day lockdown, which came into force on Wednesday, has triggered an exodus of migrant workers from many cities.Credit – Business Standard Private Ltd. 
Heartbreaking visuals: A little boy fell asleep on a suitcase as his migrant parents take a long journey home from Punjab to Uttar Pradesh https://t.co/HcGEFRCKI4

मैं कैसे तुझको याद करूँ – शशि कुमार आँसू

Simpi Shashi Singh Happy 15th Anniversary

मैं कैसे तुझको याद करूँ,
तुझे देखूं या बात करूँ।
मैं कैसे तुझे याद करूँ।।

वो बातेँ जब याद आती है
रोयां रोयां खील जाता है

मैं तन्हा सूरज तकता था!
एक रोज़ अचानक तू आयी!
क्या उस पल का अहसास धरूँ
मैं कैसे तुझे याद करूँ।।

कैसे मैं तुझको याद करूँ,
पंद्रह बसंत लो अब बीत गये,
जब मिले थे कितने कच्चे थे!
हाँ-हाँ शायद हम बच्चे थे।

अब कैसी हो क्या बात करूँ!
बस वैसी हो जिसके साथ रहूँ ।

तेरी आँखे आज भी वैसी है
बस कच्ची कैरी की जैसी है।
इठलाती हुई बलखाती हुई
महकाती हुई दमकाती हुई।

जब-जब तुम काज़ल करती हो
तन मन घायल हो जाता है,

बन ठन कर जब तुम चलती हो
मन फिर पागल हो जाता है।

मैं कैसे तुझको याद करूँ,
मुस्काती हुई, भरमाती हुई,
कभी गाती हुई , शर्माती हुई,
कभी धीरे से सुर्ख होठों से
‘आँसू’ कहके बुलाती हुई

जब जब बाल में रुके बूंदों को,
बल खाके तुम झटकती हो,
सच कहता हूँ मर जाता …
जब मुड़कर तुम मुस्काती हो।

मैं कैसे तुझको याद करूँ,
पल-पल में तुम रग-रग में तुम
नींदों में तुम सपनों में तुम,
मैं चाहता तुमको
सिर्फ हूँ।
में माँगता तुमको
सिर्फ हूँ।

मैं कैसे तुझको याद करूँ,
तुमसे लड़ूँ या तुझे प्यार करूँ,
किस आनंद का साक्षात्कार करूँ
।।

तेरी बातें तेरे गोरे गाल सी है,
गुस्से में वो सुर्ख लाल सी है।
मैं गेंदा जैसा खीला हुआ,
तुम गुलमुहर कमाल सी है।

तुम कहो तुझे मैं क्यूँ याद करूँ!
बस तेरे साथ जीऊँ रोमांस करूँ
हर क्षण हर पल तेरे साथ रहूँ
तेरे साथ जीऊँ तेरे साथ मरूँ।


© शशि कुमार ‘आँसू ‘

I Love You SIMPI SINGH

Happy 15th Anniversary
Simpi Shashi Singh & Shashi Kumar Aansoo

क्या थे क्या हो गये हैं हम – प्रभाकर “प्रभू”

मन कहीं टिकता नहीं
भागता है रुकता नहीं
दिन रात जैसे भाग रहा
और उम्मीदें साज रहा
पर कर्म अब भी शून्य है
क्या पाप है क्या पुण्य है
अगर ये भी ज्ञात हो
कि जीत हो या मात हो
ये कर्म ही सर्वोपरि है
और मेहनत ही बड़ी है
जागना था पर सो गये हैं हम
क्या थे क्या हो गये हैं हम
हर निशा संकल्प लेकर
और नयन को स्वप्न देकर
धोखा ही देते आयें हैं
फिर ख़ुद को ही बचायें हैं
कल हुआ तो कल होगा
सफल या विफल होगा
पर मन को समझाये कौन
बेबस यूँ पड़ा है मौन
किस्मत को ही कोसना है
पर ख़ुद को नहीं टोकना है
काटना है जो बो गये हैं हम
क्या थे क्या हो गये हैं हम
मन से जिस दिन निकल गये
समझो राह पकड़ लिये
बस आगे बढ़ते जाना है
और पास नहीं ठिकाना है
जितना दूर तुम जाओगे
ये दुनिया पास तुम पाओगे
जब रक्त पसीना बन जायेगा
तब मन पे क़ाबू हो जायेगा
पर ये सोच के ना रुक जाना
और लौट के मन को ना आना
जैसा चाहा ना हुआ तो फिर
दुनिया मुझपर हँसेगी फिर
कल को किसने देखा है
तुमको किसने रोका है
आज तुम्हारी बारी है
कर लो जो तैयारी है
हँसते हैं तो हँसने दो
जो कहते हैं कहने दो
पर तुमने जो ठाना है
उसको कर दिखाना है
बातों बातों में खो गये हैं हम
क्या थे क्या हो गये हैं हम
©प्रभाकर “प्रभू”

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मज़दूर हूँ मैं – प्रभाकर “प्रभू”

आज के हालात पर एक कविता जो की प्रभाकर कुमार ने लिखी है
कृप्या पूरा पढ़ें और शेयर जरूर करें।

ना बेबस और ना लाचार हूँ
हाँ मगर गरीबी पे सवार हूँ
मेहनत ही अपना परिचय है

पर ये अच्छा नहीं समय है
वर्षों का दस्तूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

जो लहू हमारा लगता है
तो पसीना आपको दिखता है

बहुत किया है हमने काम
और बदले में दिया सलाम
भूख के हाथों मज़बूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

हमारा ना कोई सपना है
कब जीना कब मरना है
ठिकाना अपना एक नहीं
जीने का मौक़ा अनेक नहीं

मरा हुआ जीवित जरूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

मन में एक सवाल है साहेब
ये कैसा बवाल है साहेब
घर परिवार को छोड़ा है
कसमें वादे सब तोड़ा है
एक सपना देकर आया था
एक वक़्त ही रोटी खाया था
एक साड़ी एक खिलौना है
जिसको घर तक ढोना है
पास नहीं है मेरे पैसे
तो फिर घर जाऊँगा कैसे
घर मेरे पहुँचा दो साहेब
टिकेट एक करवा दो साहेब
खा रहा हूँ ठोकर कब से
विनती कर रहा हूँ सब से
कोई नहीं मेरी सुनता है
बस दूर रहो ये कहता है
जाने क्या कहती है सरकार
ये भी वो भी है अधिकार

पर शायद उनको दिखता नहीं
और कोई उनको कहता नहीं
देखो पास मेरे क्या आया है
पुलिस का डंडा ही खाया है
गलती क्या है जो मज़दूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

©प्रभाकर “प्रभू” – Writer, Poet, Actor

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मैं वक़्त हूँ फिर न वापस आऊंगा – शशि कुमार आँसू

मै वक्त हूँ फिर न वापस आऊंगा
जब बेला आएगी अलविदा कह जाऊंगा ।

तेरी तुम फिर अब देख लो
कुछ बचा है! तो तुम समेट लो
तुम देख लो क्या लाए थे!
तुम सोच लो क्या पाए लिए!

क्या मिल गया जो ठहर गए!
क्या कर लिया जो यूँ बिफर गए!
तुम किस नगर में ढल गए…
तुम किस डगर को चल दिए।

तुम किस कदर के ढीठ हो
ना जीत की तुझमे आग है,
ना प्रीत की तुझमे राग है,
सांत्वना बस अपरम्पार है।

तुम सोचते हो क्या हो जाएगा!
जो नसीब में है सब मिल जाएगा!
वो क्या है जिस पर गुमान है!
क्या अंतिम तेरी यही उड़ान है!

अंगीकार तुझे इस बात का हो
की तुम शुन्य पर सवार हो।
बहानों से भरे तेरे तिलिस्म मे,
तुम आत्ममुग्धता के शिकार हो।

तेरे बाजुओं में क्या दम नहीं
या जीत का अवचेतन नहीं!
जब सब छोड़कर तुम जाओगे!
किस बात पर आह्लाद पाओगे!!

तुम्हें किस कमी की शिकायत है?
जो नहीं मिला, तो नहीं मिला
जो नहीं किया, तो नहीं किया
ये सोच कर तु गिला न कर।

सब रिवायतों को तुम तोड़कर
सब जकड़नो को तुम छोड़ कर
जो पल बचा उसे सब जोड़ कर
प्रतिज्ञा तुम अब कठोर कर!

प्रचंड धीर अब बनेगा तुम।
न थकेगा तुम, न रुकेगा तुम।
कमजोरियों को तज़ कर सब,
श्रम की पराकाष्ठा करेगा तुम।।

मै वक्त हूँ फिर न वापस आऊंगा
नादान हो! मुझे जुमला समझ लो!
सुजान हो! मेरे इश्क़ मे पड़ लो।
मै वक्त हूँ नाम तेरा स्वर्णाक्षर से लिखऊँगा।

कविता By शशि कुमार ‘आँसू’

संघर्ष तेरा हो तो क्यूँ नहीं वो राम सा हो
प्रयत्न तेरा हो तो क्यूँ नहीं वो श्याम सा हो।

#Disclaimer – Opinions expressed are solely my own or drawn from innumerable centers of culture & lore. It do not express the views or opinions of my employer.

माँ! तुम होती तो कैसा होता – शशि कुमार आँसू

माँ! तुम होती तो कैसा होता
आज मैं भी इठला रहा होता।

मैंने हर जगह ढूंढा तुमको
कभी तेरे किताबों के पन्नों मे
कभी तेरे छोड़ गए गहनों मे
कभी तेरे अधूरे लिखे लब्ज़ो में
कभी तेरी मनमोहनी किस्सों मे ।

मैंने हर जगह ढूंढा तुमको
पर तुम मुझे कहीं ना मिली!

क्या था जो मुझको तज़ गयी
क्या बस एक दिवस का साथ था!
तुम यूँ क्यूँ पंचतत्तव मे बिखर गयी!
किस भरोसे छोड़ तुम ऊपर चली गयी!

क्या कुछ मातृत्व से बेहतर मिल गया
क्यों काल तुम्हें मुझसे यूँ छीन गया!
भगवान थे! रुक जाते वो!
कहती तो शायद झूक जाते वो

क्या उनको ये मालूम न था?
उनके रचे इस लोक में,
कैसे माँ के बिन जिऊँगा मैं
तानो से भरे बिघ्न दंश में,
कितनी रुदन सहूंगा मैं।

माँ! तुम ही अब कहो यहाँ
किस किस को माँ कहूँगा मैं।

क्या मुझमें कोई कमी रही
क्या मुझसे तुम नाराज थी
बस जन्म दिन और चल दिये
क्या देखने की जिद्द न थी!
या दिखलाने की मर्म न था!

माँ! तुम होती तो कैसा होता
माँ! तुम होती तो कैसा होता

माँ! ये कौन सा नसीब है!
न तु है! न तेरी तस्वीर है!
शिकवा है पर उस रब से है
माँ! तुझसे कोई गीला नहीं।

तुम लड़ गयी होगी काल से
जब मैं भी तुझे मिला नहीं।

माँ! मैं सबसे अक्सर पूछता हूँ
तेरी शक्लों सूरत कैसी थी?
बस लोग अक्सर कहते हैं,
तेरी आंखे बस मेरी जैसी थी।

यूं तो लबरेज थी पानी से पर
बरसात में नाचती मोरनी सी थी।

माँ! तुम होती तो अच्छा होता
सच! मैं आज इठला रहा होता।

ज़रा फ़ासले से रहा करें – शशि कुमार आँसू

कोई हाथ भी अब न बढ़ाएगा बस कहिये ‘नमस्ते’ तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से रहा करें।।