Share Your Happiness : न जाने कल हो न हो!

Happiness is real when it’s shared with whom we are being cared…

शायद हम अटक कर रह जाते है हरदम दुसरो को गलत सिद्ध करने में समय व्यतित कर देते है और समय कब दगा दे जाता है पता नही चलता!!

चलो सबको माफ करो! खुशी के पल को जी भर के जियो! साथ होने का अहसास का आनंद लो। ख़ुद को टेक्नोलॉजी पर ज्यादा कंज़्यूम मत करो… अड़चनों से थोड़ा आगे बढ़ो!

न जाने कल हो न हो!

Fight In The Arena – मेरी बात

You Must Not allow people to mistune your emotions & poison the day with their words. Some People find opportunity to dash You Therefore You need to have patience. Bring Stability, permanence (ठहराव) in your Karma. Don’t let impatience mind govern your decisions & actions. Impatience behavior gives nothing except pang of guilt. Keep yourself calm & ambitious enough to fight with all petty things.

When you are #ambitious you automatically busy & when you busy you automatically respectful for other person & profession . Critics are the least ambitious one who avoid failure doing nothing but criticizing others. Here the man only matters who fought in the arena.

Be the man of arena. keep rejuvenating yourself. Learn & Rise

#Respectful #सत्यवचन #ShashiKumarAansoo #BlogPost #Mytruth #monologue #MySpeak # Speaking Shashi #मेरी बात

एक परी दूर जगत की

आते जाते सुना था सबसे
एक परी वो दूर जगत से

बैठ के आयी एक किश्ती में
दूर जहां से एक बस्ती में

मिलेगी मुझसे कब वो डर है
थोड़ा दूर यहां से उसका घर है

चलो तो उसको ढूंढ़ कर लाएं
आरज़ू दिल की सब कह सुनाएं।।

मैं जो हूँ :भवानी प्रसाद मिश्र की कविता

मैं जो हूँ
मुझे वही रहना चाहिए
यानी
वन का वृक्ष
खेत की मेड़
नदी की लहर
दूर का गीत
व्यतीत
वर्तमान में
उपस्थित भविष्य में
मैं जो हूँ मुझे वही रहना चाहिए
तेज़ गर्मी
मूसलाधार वर्षा
कड़ाके की सर्दी
ख़ून की लाली
दूब का हरापन
फूल की जर्दी
मैं जो हूँ
मुझे अपना होना
ठीक ठीक सहना चाहिए
तपना चाहिए
अगर लोहा हूँ
हल बनने के लिए
बीज हूँ
तो गड़ना चाहिए
फल बनने के लिए
मैं जो हूँ
मुझे वह बनना चाहिए
धारा हूँ अंत:सलिला
तो मुझे कुएँ के रूप में
खनना चाहिए
ठीक ज़रूरतमंद हाथों से
गान फैलाना चाहिए मुझे
अगर मैं आसमान हूँ
मगर मैं
कब से ऐसा नहीं
कर रहा हूँ
जो हूँ
वही होने से डर रहा हूँ।

सखि, वे मुझसे कहकर जाते (यशोधरा)

सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?

           मुझको बहुत उन्होंने माना
           फिर भी क्या पूरा पहचाना?
           मैंने मुख्य उसी को जाना
           जो वे मन में लाते।

सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

           स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
           प्रियतम को, प्राणों के पण में,
           हमीं भेज देती हैं रण में -
           क्षात्र-धर्म के नाते।

सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

           हुआ न यह भी भाग्य अभागा,
           किसपर विफल गर्व अब जागा?
           जिसने अपनाया था, त्यागा;
           रहे स्मरण ही आते!

सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

           नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
           पर इनसे जो आँसू बहते,
           सदय हृदय वे कैसे सहते?
           गये तरस ही खाते!

सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

           जायें, सिद्धि पावें वे सुख से,
           दुखी न हों इस जन के दुख से,
           उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से?
           आज अधिक वे भाते!

सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

           गये, लौट भी वे आवेंगे,
           कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे,
           रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
           पर क्या गाते-गाते?

सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

  • मैथिलीशरण गुप्त

नचिकेता की कहानी : दुनिया का पहला जिज्ञासु

कठ उपनिषद में नचिकेता को सबसे पहला साधक बताया गया है। नचिकेता मृत्यु का भेद जानने के लिए यम के द्वार तक पहुंच गया था। जानते हैं नचिकेता के प्रश्न और यम के उत्तर के बारे में

नचिकेता के पिता का यज्ञ
नचिकेता को दुनिया का पहला जिज्ञासु माना जाता है – कम से कम पहला महत्वपूर्ण जिज्ञासु। एक उपनिषद् भी उस से शुरू होता है। नचिकेता एक छोटा बालक था। उसके पिता ने एक यज्ञ करने की शपथ ली थी। यह एक ऐसा पवित्र अनुष्ठान था, जिसमें उन्हें अपनी सारी सांसारिक संपत्ति – अपना घर, अपना सारा सामान, यहां तक कि अपनी पत्नी, अपने बच्चे, यानी अपना सब कुछ ऋषियों, ब्राह्मणों और दूसरे लोगों को दान में दे देना था। इस तरह के यज्ञ से आप आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करते हैं। यह एक ऐसा साधन है, जिसे पारंपरिक रूप से रचा गया है।

नचिकेता के पिता ने बेकार की चीज़ें दान कर दीं
कुछ लोग आध्यात्मिक ज्ञान के लिए इस तरह का शपथ लेते हैं। नचिकेता के पिता ने यह शपथ ली और और उन्होंने अपनी सभी बीमार गायें, बेकार संपत्ति और जिन चीजों की उन्हें जरूरत नहीं थी, जो किसी न किसी रूप में उनके लिए बोझ थीं, वे सब दान में दे डालीं। उन्होंने खूब दिखावा किया मगर जिन चीजों की उन्हें वाकई जरूरत थी, जैसे अपनी दोनों पत्नियों और बच्चे को, उनको उन्होंने अपने पास ही रखा। नचिकेता को यह सब देखकर बहुत दुख हुआ। उसने देखा कि उसके पिता ने ईमानदारी नहीं दिखाई। उसके पिता ने शपथ ली थी कि वह सब कुछ दान करके आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करेंगे, मगर उन्होंने चालाकी की। नचिकेता अपने पिता के पास गया और इस बारे में उनसे बात करने लगा। उसकी उम्र उस समय सिर्फ पांच साल की थी, मगर उसमें असाधारण समझदारी थी।

नचिकेता ने अपने पिता को समझाना चाहा
नचिकेता ने अपने पिता से कहा, ‘आपने ठीक नहीं किया। अगर आप सब कुछ देना नहीं चाहते थे, तो आपको यह शपथ नहीं लेनी चाहिए थी। एक बार शपथ लेने के बाद, आपको सब कुछ दे देना चाहिए। मुझे बताइए कि आप मुझे किसको दान करने वाले हैं?’ उसके पिता क्रोधित हो गए और बोले, ‘मैं तुम्हें यम को देने वाला हूं।’ यम मृत्यु के देवता होते हैं। बालक ने अपने पिता की बात को बहुत गंभीरता से लिया और यम के पास जाने के लिए तैयार होने लगा। फिर वह यम के पास चला गया। यह मत सोचिए कि ‘वह कैसे गया होगा, शरीर के साथ या शरीर छोड़कर?’ मुद्दा यह नहीं है। बस वह यम के पास चला गया।

यम की प्रतीक्षा में नचिकेता ने बिताए तीन दिन
यम उस समय यमलोक में नहीं थे। वह घूमने गए हुए थे। उन्हें घर-घर जाना पड़ता है। तो वह घूमने गए हुए थे। नचिकेता पूरे तीन दिन तक इंतजार करता रहा। एक छोटा सा बालक भोजन-पानी के बिना यम के द्वार पर इंतजार करता रहा। तीन दिन बाद यम लौटे तो उन्होंने पूरी तरह थके और भूखे, मगर पक्के इरादे वाले इस छोटे से बालक को देखा। वह बिना हिले-डुले वहां बैठा हुआ था। वह भोजन की तलाश में इधर-उधर भी नहीं गया था। वह बस वहां बैठकर यम की प्रतीक्षा कर रहा था। यम इस बालक के पक्के इरादे से बहुत प्रभावित हुए, जो तीन दिन से प्रतीक्षा कर रहा था, वह भी बिना कुछ ग्रहण किए। वह बोले, ‘मुझे यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि तुम तीन दिन से मेरा इंतजार कर रहे हो। तुम्हें क्या चाहिए? मैं तुम्हें तीन वरदान देता हूं। बताओ, तुम क्या चाहते हो?’

नचिकेता ने पूछा मृत्यु के रहस्य के बारे में
नचिकेता ने सबसे पहले कहा, ‘मेरे पिता बहुत लालची हैं। वह सांसारिक सुख-सुविधाएं चाहते हैं। इसलिए आप उन्हें सारे भौतिक ऐशोआराम का आशीर्वाद दें। उन्हें राजा बना दीजिए।’ यम ने कहा ‘तथास्तु’। उसने दूसरा वरदान मांगा, ‘मैं जानना चाहता हूं कि मुझे ज्ञान प्राप्त करने के लिए किस तरह के कर्मों और यज्ञों को करने की जरूरत है।’ वैदिक साहित्य में हमेशा यज्ञों की बात की जाती है। सारा वैदिक साहित्य ऐसा ही है – यज्ञों के बारे में। यम ने उसे सिखाया कि उसे क्या करना चाहिए।
फिर नचिकेता ने उनसे पूछा, ‘मृत्यु का रहस्य क्या है? मृत्यु के बाद क्या होता है?’ यम ने कहा, ‘यह प्रश्न तुम वापस ले लो। तुम मुझसे और कुछ भी मांग लो। तुम चाहो तो मुझसे एक राज्य मांग लो, मैं तुम्हें दे दूंगा। मैं तुम्हें धन-दौलत दे सकता हूं। मैं तुम्हें दुनिया के सारे सुख दे सकता हूं।’ वह बोलते रहे, ‘तुम मुझे बताओ, क्या चाहते हो। तुम मुझसे दुनिया की सारी खुशियां ले लो, मगर यह प्रश्न मत पूछो।’ नचिकेता ने कहा, ‘इन सब का मैं क्या करूंगा? आप पहले ही मुझे बता चुके हैं कि ये सब चीजें नश्वर हैं। मैं पहले ही समझ चुका हूं कि सारे क्रियाकलाप, लोग जिन चीजों में सं लिप्त हैं, वे सब अर्थहीन हैं। वह सिर्फ दिखता है, वह हकीकत नहीं है। फिर मुझे और धन-दौलत देने का क्या लाभ? वह तो मेरे लिए सिर्फ एक जाल होगा। मैं कुछ नहीं चाहता, आप बस मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए।’

नचिकेता को हुई परम ज्ञान की प्राप्ति
यम ने इस सवाल को टालने की हर संभव कोशिश की। वह बोले, ‘देवता भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं जानते। मैं तुम्हें नहीं बता सकता।’ नचिकेता ने कहा, ‘अगर ऐसा है, अगर देवता भी इसका उत्तर नहीं जानते और सिर्फ आप जानते हैं, तब तो आपको इसका उत्तर देना ही होगा।’
उसने अपनी जिद नहीं छोड़ी। यम एक बार फिर उसे वहीं छोड़कर महीनों के लिए घूमने चले गए। वह किसी तरह सिर्फ इस बालक से पीछा छुड़ाना चाहते थे। मगर बालक कई महीनों तक वहीं डटा रहा। कहा जाता है कि यम के द्वार पर ही उसे पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हुई। उसे अस्तित्व के सारे प्रश्नों के जवाब मिल गए और उसने खुद को विलीन कर दिया। वह प्रथम जिज्ञासु था। इसलिए हमेशा उसे एक आदर्श की तरह प्रस्तुत किया जाता है। उस तरह का पक्का इरादा रखने वाला पांच साल का बालक, जो चॉकलेट या डिजनीलैंड की यात्रा जैसे लालच में नहीं पड़ा। वह सिर्फ ज्ञान चाहता था

ज्ञान पाने की प्रबल इच्छा का महत्व
इस तरह के व्यक्ति के लिए किसी तरह के मार्ग की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि मंजिल यहीं है, वेलंगिरि पहाड़ियों की चोटी पर नहीं है। जब मंजिल यहां नहीं होती, तब वह वेलंगिरि पहाड़ियों पर होती है और हमें धीरे-धीरे उन पर चढ़ना पड़ता है। जब आप नचिकेता की तरह होते हैं, तो आपको किसी मार्ग की जरूरत नहीं होती। सब कुछ यहीं मिल जाता है। कहीं जाने की जरूरत नहीं होती। यहां हम जो कुछ कर रहे हैं, इसका पूरा मकसद उस तीव्रता को पैदा करना है। इच्छा को इतना प्रबल और शक्तिशाली होना चाहिए कि ईश्वर आपसे दूर न रह सके और दिव्यता आपको नजरअंदाज न कर पाए। ऐसा नहीं है कि दिव्यता आपको नजरअंदाज करने की कोशिश करता है, मगर आपका मन और अहं लाखों अलग-अलग तरीकों से वास्तविकता पर पर्दा डाल कर उसे आपकी आंखों से ओझल करने की कोशिश करते हैं।

आपकी तीव्रता ही आपको रूपांतरित करती है
चाहे आप कर्म के पथ पर चलें या ज्ञान, क्रिया या भक्ति के पथ पर, आपकी तीव्रता ही आपको इन रास्तों पर आपको आगे बढ़ाती है, न कि खुद ये रास्ते। अगर तीव्रता न हो, तो कोई क्रिया कुछ नहीं कर सकती। जब तीव्रता इन क्रियाओं में आ जाती है, तो उनमें आपको एक अलग आयाम तक ले जाने की शक्ति होती है।
यानी यह क्रिया नहीं है जो आपको रूपांतरित करती है, बल्कि आपकी तीव्रता आपको रूपांतरित करती है। जब आपमें ये तीव्रता होती है, तो क्रिया एक जबरदस्त सहारा है जो उस तीव्रता को और बढ़ता है। क्रियाओं का सारा मकसद यही है। चाहे आप किसी भी मार्ग पर भी चलें, पथ का अनुसरण आपको कोई ज्ञान प्राप्त नहीं करा सकता, जब तक कि आपके अंदर वह तीव्रता न हो।

सौ फीसदी या बिल्कुल नहीं
अगर आप आधे दिल से किसी से प्रेम करते हैं, तो वह प्रेम नहीं है। प्रेम या तो सौ फीसदी होता है या बिल्कुल नहीं। अगर आपको लगता है कि आप किसी से 99 फीसदी प्रेम कर सकते हैं, तो आपने प्रेम को जाना ही नहीं है। किसी भी तरह के क्रियाकलाप पर यही बात लागू होती है। अगर आप कोई कार्य सौ फीसदी नहीं करते, तो उसका कोई मतलब नहीं है। उसका कोई अच्छा नतीजा नहीं निकलेगा।। ज्यादा से ज्यादा वह आपका पेट भर सकता है। जब तक कि आप कोई काम सौ फीसदी न करें, वह आपको रूपांतरित नहीं कर सकता। जब तक कि आपका प्रेम सौ फीसदी न हो, वह आपको रूपांतरित नहीं कर सकता। वह लेन-देन की तरह कुछ पाने का एक जरिया हो सकता है, मगर अस्तित्व के अर्थों में उसका कोई मूल्य नहीं है।

सद्‌गुरु जग्गी वासुदेव

साभार : https://hindi.speakingtree.in/

अभी भी जिंदा हूँ – एक कविता

माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।
पर देख ये सब शर्मिंदा हूँ।।

कहने को बहुत प्रोग्रेसिव हूँ
पर सच में बहुत निगेटिव हूँ।
जब देखता हूँ तेरे आँगन को
मन हीं मन बहुत घबराता हूँ।

कोविड से लड़ते सब दुःख सहते,
पथरीले पथ पर अविरल चलते
माँ को ढोते निढाल सपनों को

देख ये सब बहुत शर्मिंदा हूँ।
माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।

कुछ निखट निपोरे प्रयत्नों को
देख कर सियासी सब यत्नो को
सड़क पर चलते धुप में जलते
हालत के मारे हम वतनों को

देख ये सब बहुत शर्मिंदा हूँ।
माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।

ये नुका छिपी और दाव पेंच मे
तिल-तिल कर मरते तेरे रत्नों को
सह और मात के खुराफात मे
गर्त में डूबते का सब संयंत्रो को

देख ये सब बहुत शर्मिंदा हूँ।
माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।

भूखे मदद की गुहार लगाते
सियासत दनों के ताल पर नचते
अपनी कल की राह को तकते
आशाओं का बस एक पुलिंदा हूँ

माँ देख अभी भी जिंदा हूँ।
माँ देख अभी भी जिंदा हूँ।।

©शशि कुमार ‘आँसू’

https://images.app.goo.gl/R4xDtsJrpxbUYT8r7
The 21-day lockdown, which came into force on Wednesday, has triggered an exodus of migrant workers from many cities.Credit – Business Standard Private Ltd. 
Heartbreaking visuals: A little boy fell asleep on a suitcase as his migrant parents take a long journey home from Punjab to Uttar Pradesh https://t.co/HcGEFRCKI4

मैं कैसे तुझको याद करूँ

Simpi Shashi Singh Happy 15th Anniversary

मैं कैसे तुझको याद करूँ,
तुझे देखूं या बात करूँ।
मैं कैसे तुझे याद करूँ।।

वो बातेँ जब याद आती है
रोयां रोयां खील जाता है

मैं तन्हा सूरज तकता था!
एक रोज़ अचानक तू आयी!
क्या उस पल का अहसास धरूँ
मैं कैसे तुझे याद करूँ।।

कैसे मैं तुझको याद करूँ,
पंद्रह बसंत लो अब बीत गये,
जब मिले थे कितने कच्चे थे!
हाँ-हाँ शायद हम बच्चे थे।

अब कैसी हो क्या बात करूँ!
बस वैसी हो जिसके साथ रहूँ ।

तेरी आँखे आज भी वैसी है
बस कच्ची कैरी की जैसी है।
इठलाती हुई बलखाती हुई
महकाती हुई दमकाती हुई।

जब-जब तुम काज़ल करती हो
तन मन घायल हो जाता है,

बन ठन कर जब तुम चलती हो
मन फिर पागल हो जाता है।

मैं कैसे तुझको याद करूँ,
मुस्काती हुई, भरमाती हुई,
कभी गाती हुई , शर्माती हुई,
कभी धीरे से सुर्ख होठों से
‘आँसू’ कहके बुलाती हुई

जब जब बाल में रुके बूंदों को,
बल खाके तुम झटकती हो,
सच कहता हूँ मर जाता …
जब मुड़कर तुम मुस्काती हो।

मैं कैसे तुझको याद करूँ,
पल-पल में तुम रग-रग में तुम
नींदों में तुम सपनों में तुम,
मैं चाहता तुमको
सिर्फ हूँ।
में माँगता तुमको
सिर्फ हूँ।

मैं कैसे तुझको याद करूँ,
तुमसे लड़ूँ या तुझे प्यार करूँ,
किस आनंद का साक्षात्कार करूँ
।।

तेरी बातें तेरे गोरे गाल सी है,
गुस्से में वो सुर्ख लाल सी है।
मैं गेंदा जैसा खीला हुआ,
तुम गुलमुहर कमाल सी है।

तुम कहो तुझे मैं क्यूँ याद करूँ!
बस तेरे साथ जीऊँ रोमांस करूँ
हर क्षण हर पल तेरे साथ रहूँ
तेरे साथ जीऊँ तेरे साथ मरूँ।


© शशि कुमार ‘आँसू ‘

I Love You My Darling

Happy 15th Anniversary
Simpi Shashi Singh & Shashi Kumar Aansoo

क्या थे क्या हो गये हैं हम

मन कहीं टिकता नहीं
भागता है रुकता नहीं
दिन रात जैसे भाग रहा
और उम्मीदें साज रहा
पर कर्म अब भी शून्य है
क्या पाप है क्या पुण्य है
अगर ये भी ज्ञात हो
कि जीत हो या मात हो
ये कर्म ही सर्वोपरि है
और मेहनत ही बड़ी है
जागना था पर सो गये हैं हम
क्या थे क्या हो गये हैं हम
हर निशा संकल्प लेकर
और नयन को स्वप्न देकर
धोखा ही देते आयें हैं
फिर ख़ुद को ही बचायें हैं
कल हुआ तो कल होगा
सफल या विफल होगा
पर मन को समझाये कौन
बेबस यूँ पड़ा है मौन
किस्मत को ही कोसना है
पर ख़ुद को नहीं टोकना है
काटना है जो बो गये हैं हम
क्या थे क्या हो गये हैं हम
मन से जिस दिन निकल गये
समझो राह पकड़ लिये
बस आगे बढ़ते जाना है
और पास नहीं ठिकाना है
जितना दूर तुम जाओगे
ये दुनिया पास तुम पाओगे
जब रक्त पसीना बन जायेगा
तब मन पे क़ाबू हो जायेगा
पर ये सोच के ना रुक जाना
और लौट के मन को ना आना
जैसा चाहा ना हुआ तो फिर
दुनिया मुझपर हँसेगी फिर
कल को किसने देखा है
तुमको किसने रोका है
आज तुम्हारी बारी है
कर लो जो तैयारी है
हँसते हैं तो हँसने दो
जो कहते हैं कहने दो
पर तुमने जो ठाना है
उसको कर दिखाना है
बातों बातों में खो गये हैं हम
क्या थे क्या हो गये हैं हम
©प्रभाकर “प्रभू”

कविता #poetry #poet #kavyamanjari #motivational

मज़दूर हूँ मैं – प्रभाकर “प्रभू”

आज के हालात पर एक कविता जो की प्रभाकर कुमार ने लिखी है
कृप्या पूरा पढ़ें और शेयर जरूर करें।

ना बेबस और ना लाचार हूँ
हाँ मगर गरीबी पे सवार हूँ
मेहनत ही अपना परिचय है

पर ये अच्छा नहीं समय है
वर्षों का दस्तूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

जो लहू हमारा लगता है
तो पसीना आपको दिखता है

बहुत किया है हमने काम
और बदले में दिया सलाम
भूख के हाथों मज़बूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

हमारा ना कोई सपना है
कब जीना कब मरना है
ठिकाना अपना एक नहीं
जीने का मौक़ा अनेक नहीं

मरा हुआ जीवित जरूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

मन में एक सवाल है साहेब
ये कैसा बवाल है साहेब
घर परिवार को छोड़ा है
कसमें वादे सब तोड़ा है
एक सपना देकर आया था
एक वक़्त ही रोटी खाया था
एक साड़ी एक खिलौना है
जिसको घर तक ढोना है
पास नहीं है मेरे पैसे
तो फिर घर जाऊँगा कैसे
घर मेरे पहुँचा दो साहेब
टिकेट एक करवा दो साहेब
खा रहा हूँ ठोकर कब से
विनती कर रहा हूँ सब से
कोई नहीं मेरी सुनता है
बस दूर रहो ये कहता है
जाने क्या कहती है सरकार
ये भी वो भी है अधिकार

पर शायद उनको दिखता नहीं
और कोई उनको कहता नहीं
देखो पास मेरे क्या आया है
पुलिस का डंडा ही खाया है
गलती क्या है जो मज़दूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

©प्रभाकर “प्रभू” – Writer, Poet, Actor

#petry #कविता #poet #kavyamanjari

मैं वक़्त हूँ फिर न वापस आऊंगा – कविता

मै वक्त हूँ फिर न वापस आऊंगा
जब बेला आएगी अलविदा कह जाऊंगा ।

तेरी तुम फिर अब देख लो
कुछ बचा है! तो तुम समेट लो
तुम देख लो क्या लाए थे!
तुम सोच लो क्या पाए लिए!

क्या मिल गया जो ठहर गए!
क्या कर लिया जो यूँ बिफर गए!
तुम किस नगर में ढल गए…
तुम किस डगर को चल दिए।

तुम किस कदर के ढीठ हो
ना जीत की तुझमे आग है,
ना प्रीत की तुझमे राग है,
सांत्वना बस अपरम्पार है।

तुम सोचते हो क्या हो जाएगा!
जो नसीब में है सब मिल जाएगा!
वो क्या है जिस पर गुमान है!
क्या अंतिम तेरी यही उड़ान है!

अंगीकार तुझे इस बात का हो
की तुम शुन्य पर सवार हो।
बहानों से भरे तेरे तिलिस्म मे,
तुम आत्ममुग्धता के शिकार हो।

तेरे बाजुओं में क्या दम नहीं
या जीत का अवचेतन नहीं!
जब सब छोड़कर तुम जाओगे!
किस बात पर आह्लाद पाओगे!!

तुम्हें किस कमी की शिकायत है?
जो नहीं मिला, तो नहीं मिला
जो नहीं किया, तो नहीं किया
ये सोच कर तु गिला न कर।

सब रिवायतों को तुम तोड़कर
सब जकड़नो को तुम छोड़ कर
जो पल बचा उसे सब जोड़ कर
प्रतिज्ञा तुम अब कठोर कर!

प्रचंड धीर अब बनेगा तुम।
न थकेगा तुम, न रुकेगा तुम।
कमजोरियों को तज़ कर सब,
श्रम की पराकाष्ठा करेगा तुम।।

मै वक्त हूँ फिर न वापस आऊंगा
नादान हो! मुझे जुमला समझ लो!
सुजान हो! मेरे इश्क़ मे पड़ लो।
मै वक्त हूँ नाम तेरा स्वर्णाक्षर से लिखऊँगा।

कविता By शशि कुमार ‘आँसू’

संघर्ष तेरा हो तो क्यूँ नहीं वो राम सा हो
प्रयत्न तेरा हो तो क्यूँ नहीं वो श्याम सा हो।

#Disclaimer – Opinions expressed are solely my own or drawn from innumerable centers of culture & lore. It do not express the views or opinions of my employer.

माँ! तुम होती तो कैसा होता

माँ! तुम होती तो कैसा होता
आज मैं भी इठला रहा होता।

मैंने हर जगह ढूंढा तुमको
कभी तेरे किताबों के पन्नों मे
कभी तेरे छोड़ गए गहनों मे
कभी तेरे अधूरे लिखे लब्ज़ो में
कभी तेरी मनमोहनी किस्सों मे ।

मैंने हर जगह ढूंढा तुमको
पर तुम मुझे कहीं ना मिली!

क्या था जो मुझको तज़ गयी
क्या बस एक दिवस का साथ था!
तुम यूँ क्यूँ पंचतत्तव मे बिखर गयी!
किस भरोसे छोड़ तुम ऊपर चली गयी!

क्या कुछ मातृत्व से बेहतर मिल गया
क्यों काल तुम्हें मुझसे यूँ छीन गया!
भगवान थे! रुक जाते वो!
कहती तो शायद झूक जाते वो

क्या उनको ये मालूम न था?
उनके रचे इस लोक में,
कैसे माँ के बिन जिऊँगा मैं
तानो से भरे बिघ्न दंश में,
कितनी रुदन सहूंगा मैं।

माँ! तुम ही अब कहो यहाँ
किस किस को माँ कहूँगा मैं।

क्या मुझमें कोई कमी रही
क्या मुझसे तुम नाराज थी
बस जन्म दिन और चल दिये
क्या देखने की जिद्द न थी!
या दिखलाने की मर्म न था!

माँ! तुम होती तो कैसा होता
माँ! तुम होती तो कैसा होता

माँ! ये कौन सा नसीब है!
न तु है! न तेरी तस्वीर है!
शिकवा है पर उस रब से है
माँ! तुझसे कोई गीला नहीं।

तुम लड़ गयी होगी काल से
जब मैं भी तुझे मिला नहीं।

माँ! मैं सबसे अक्सर पूछता हूँ
तेरी शक्लों सूरत कैसी थी?
बस लोग अक्सर कहते हैं,
तेरी आंखे बस मेरी जैसी थी।

यूं तो लबरेज थी पानी से पर
बरसात में नाचती मोरनी सी थी।

माँ! तुम होती तो अच्छा होता
सच! मैं आज इठला रहा होता।

ज़रा फ़ासले से रहा करें

कोई हाथ भी अब न बढ़ाएगा बस कहिये ‘नमस्ते’ तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से रहा करें।।

Know All About #PayAsYouDrive Insurance

The usage-based motor insurance, popularly known as ‘Pay As You Drive’, allows customers to pay the premium depending on how many kilometers the car has traveled. In the first tranche of sanctions, the Insurance Regulatory and Development Authority of India (Irdai) approved companies such as Bharti Axa General, Go Digit, TATA AIG, ICICI Lombard, etc.

Under this insurance scheme, a customer pre-declares vehicle usage for a period of one year. Accordingly, the insurance premium will be calculated dynamically as per the pre-declared distance in km. The customer can choose from three slabs – 2500 km., 5000 km. and 7500 km – as per his/her usage need.

Where to buy?

Insurers are now offering the usage-based product through their company websites, online insurance aggregators like PolicyBazaar.com, agents and other distribution channels.

If you want to buy the policy online, then you just have to provide the odometer reading, Know Your Customer (KYC) details, and fill up a customer consumer consent form.

Should you buy?

‘Pay As You Drive’ is ideal for the customers who have multiple vehicles and may not use each vehicle as much; therefore, they may not have to pay a large premium amount.

Also, If you are someone who mostly relies on public transport or even use your vehicles rarely due to medical complications, then this will help you cut cost on your vehicle insurance.

Also, another thing to consider is that a “Pay As You Drive” product is comprehensive own damage (OD) plus third party (TP) policy and is being offered on a pilot basis for a year. Insurers are required to sell 10,000 policies in six months to be able to offer this as a regular insurance policy.

आपके पास एक से ज्यादा गाड़ियां हैं या अपनी कार के इस्तेमाल की बजाए सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना बेहतर समझते हैं, ऐसे में आपको अपनी कार की इन्श्योरेन्स प्रीमियम पर ज्यादा नहीं खर्च करना पड़ेगा। आप #PayAsYouDrive जैसे पॉलिसी ले सकते हैं @shashiaansoo

#Insurance #Inspiration #Information # GeneralInsurance #IRDA #MotorInsurance #Car Insurance #Motor insurance #PayAsYouDrive

Disclaimer – Opinions expressed are solely my own or drawn from innumerable centers of lore. It do not express the views or opinions of my employer.

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो – निदा फ़ाज़ली

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो

इधर उधर कई मंज़िल हैं चल सको तो चलो
बने बनाये हैं साँचे जो ढल सको तो चलो

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिराके अगर तुम सम्भल सको तो चलो

यही है ज़िन्दगी कुछ ख़्वाब चन्द उम्मीदें
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

हर इक सफ़र को है महफ़ूस रास्तों की तलाश
हिफ़ाज़तों की रिवायत बदल सको तो चलो

कहीं नहीं कोई सूरज, धुआँ धुआँ है फ़िज़ा
ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो

@ निदा फ़ाज़ली

सतपुड़ा के घने जंगल – भवानीप्रसाद मिश्र

सतपुड़ा के घने जंगल।
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

झाड ऊँचे और नीचे,
चुप खड़े हैं आँख मीचे,
घास चुप है, कास चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है।
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
ऊँघते अनमने जंगल।

सड़े पत्ते, गले पत्ते,
हरे पत्ते, जले पत्ते,
वन्य पथ को ढँक रहे-से
पंक-दल मे पले पत्ते।
चलो इन पर चल सको तो,
दलो इनको दल सको तो,

ये घिनौने, घने जंगल
नींद में डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

अटपटी-उलझी लताएँ,
डालियों को खींच खाएँ,
पैर को पकड़ें अचानक,
प्राण को कस लें कपाएँ।
साँप सी काली लताएँ
बला की पाली लताएँ

लताओं के बने जंगल
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

मकड़ियों के जाल मुँह पर,
और सर के बाल मुँह पर
मच्छरों के दंश वाले,
दाग काले-लाल मुँह पर,
वात-झन्झा वहन करते,
चलो इतना सहन करते,

कष्ट से ये सने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

अजगरों से भरे जंगल।
अगम, गति से परे जंगल
सात-सात पहाड़ वाले,
बड़े छोटे झाड़ वाले,
शेर वाले बाघ वाले,
गरज और दहाड़ वाले,

कम्प से कनकने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

इन वनों के खूब भीतर,
चार मुर्गे, चार तीतर
पाल कर निश्चिन्त बैठे,
विजनवन के बीच बैठे,
झोंपडी पर फूस डाले
गोंड तगड़े और काले।

जब कि होली पास आती,
सरसराती घास गाती,
और महुए से लपकती,
मत्त करती बास आती,
गूँज उठते ढोल इनके,
गीत इनके, बोल इनके

सतपुड़ा के घने जंगल
नींद मे डूबे हुए से
उँघते अनमने जंगल।

जागते अँगड़ाइयों में,
खोह-खड्डों खाइयों में,
घास पागल, कास पागल,
शाल और पलाश पागल,
लता पागल, वात पागल,
डाल पागल, पात पागल
मत्त मुर्गे और तीतर,
इन वनों के खूब भीतर।

क्षितिज तक फ़ैला हुआ-सा,
मृत्यु तक मैला हुआ-सा,
क्षुब्ध, काली लहर वाला
मथित, उत्थित जहर वाला,
मेरु वाला, शेष वाला
शम्भु और सुरेश वाला
एक सागर जानते हो,
उसे कैसा मानते हो?

ठीक वैसे घने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

धँसो इनमें डर नहीं है,
मौत का यह घर नहीं है,
उतर कर बहते अनेकों,
कल-कथा कहते अनेकों,
नदी, निर्झर और नाले,
इन वनों ने गोद पाले।

लाख पंछी सौ हिरन-दल,
चाँद के कितने किरण दल,
झूमते बन-फूल, फलियाँ,
खिल रहीं अज्ञात कलियाँ,
हरित दूर्वा, रक्त किसलय,
पूत, पावन, पूर्ण रसमय

सतपुड़ा के घने जंगल,
लताओं के बने जंगल।

Disclaimer : ये कविता भारतीय काव्य की सार्वभौमिकता को संकलित करने के उद्देश्य से विशुद्ध अव्यावसायिक रूप मे यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

नमस्ते सदा वत्सले

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥१॥

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयम्
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये।

अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम्
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्णमार्गम्
स्वयं स्वीकृतं नः सुगंकारयेत्॥२॥

समुत्कर्ष निःश्रेयसस्यैकमुग्रम्
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्राऽनिशम्।

विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम्
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥३॥

Credit :Namaste Sada Vatsale Matribhume | RSS | Akshay Pandya | Sushant Trivedi

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे, त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे, पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥ १॥

हे प्यार करने वाली मातृभूमि! मैं तुझे सदा (सदैव) नमस्कार करता हूँ। तूने मेरा सुख से पालन-पोषण किया है।

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता, इमे सादरं त्वाम नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं, शुभामाशिषम देहि तत्पूर्तये।

हे महामंगलमयी पुण्यभूमि! तेरे ही कार्य में मेरा यह शरीर अर्पण हो। मैं तुझे बारम्बार नमस्कार करता हूँ।

अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम, सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्,
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं, स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत्॥ २॥

हे सर्वशक्तिशाली परमेश्वर! हम हिन्दूराष्ट्र के अंगभूत तुझे आदरसहित प्रणाम करते हैं। तेरे ही कार्य के लिए हमने अपनी कमर कसी है। उसकी पूर्ति के लिए हमें अपना शुभाशीर्वाद दे।

समुत्कर्षनिःश्रेयसस्यैकमुग्रं, परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा, हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्राऽनिशम्।

हे प्रभु! हमें ऐसी शक्ति दे, जिसे विश्व में कभी कोई चुनौती न दे सके, ऐसा शुद्ध चारित्र्य दे जिसके समक्ष सम्पूर्ण विश्व नतमस्तक हो जाये, ऐसा ज्ञान दे कि स्वयं के द्वारा स्वीकृत किया गया यह कंटकाकीर्ण मार्ग सुगम हो जाये।

विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्, विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं, समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥ ३॥

॥ भारत माता की जय॥

उग्र वीरव्रती की भावना हम में उत्स्फूर्त होती रहे जो उच्चतम आध्यात्मिक सुख एवं महानतम ऐहिक समृद्धि प्राप्त करने का एकमेव श्रेष्ठतम साधन है। तीव्र एवं अखंड ध्येयनिष्ठा हमारे अंतःकरणों में सदैव जागती रहे।तेरी कृपा से हमारी यह विजयशालिनी संघठित कार्यशक्ति हमारे धर्म का सरंक्षण कर इस राष्ट्र को वैभव के उच्चतम शिखर पर पहुँचाने में समर्थ हो। भारत माता की जय ![1]

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना है। सम्पूर्ण प्रार्थना संस्कृत में है केवल इसकी अन्तिम पंक्ति (भारत माता की जय!) हिन्दी में है। इसे सर्वप्रथम २३ अप्रैल १९४० को पुणे के संघ शिक्षा वर्ग में गाया गया था। यादव राव जोशी ने इसे सुर प्रदान किया था। संघ की शाखा या अन्य कार्यक्रमों में इस प्रार्थना को अनिवार्यतः गाया जाता है और ध्वज के सम्मुख नमन किया जाता है।

साभार – https://hi.wikipedia.org/wiki/नमस्तेसदावत्सले
http://rss.org/

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग – फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है

तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए

जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

पुस्तक : Nuskha Hai Wafa (पृष्ठ 61)undefined


Disclaimer : ये नज़्म भारतीय काव्य की सार्वभौमिकता को एक जगह संकलित करने के उद्देश्य से विशुद्ध अव्यावसायिक रूप मे यहाँ प्रस्तुत किया गया है

हेल्थ इंश्योरेंस अब जरूरी क्यों है? Why is Health Insurance Necessary Now?

हम जानते हैं की इंडिया मे हेल्थ इनश्योरेंस कोई जबरदस्त एक्साटिंग शानदार खरीदने की चीज नहीं है। कोई भी इसे अपने टॉप विशलिस्ट मे नहीं रखता। जब भी हेल्थ इनश्योरेंस खरीदने की बात होती है सब नायाब इनोवेटिव बहाने ढूंढ लेते हैं… मसलन “बाद में कर लेंगे अभी तो जवान हैं”, “देख लेंगे अभी दूसरा काम है” , “अभी थोड़ा हाथ टाइट है नेक्स्ट टाइम करेंगे ”. यहाँ सब अपने ही एक्सक्यूज से लड़ते रहते हैं.

मैं आपसे बस एक बात कहूँगा “हाँ ये सच है कि हेल्थ इन्सुरंस या कोई भी इन्श्योरेन्स जब आप खरीदते है तो वो कोई खाश खुशी नहीं देती क्योंकि ये कोई भोग विलाश की वस्तु नहीं होती है पर याद रहे संकटकाल में इनश्योरेंस की अनुपस्थिति आपकी सारी खुशियों को बर्बाद कर सकती है।

तो चलिए आज मैं कुछ और इम्पॉर्टन्ट कारण बताता हूँ जिससे शायद आपको हेल्थ इन्श्योरेन्स की प्रासंगिकता समझने में मदद मिल पायें….

1. सबसे पहले कि हम कोई फैंटम नहीं हैं…

यहाँ कोई फैंटम नहीं हैं – Shashi Kumar Aansoo

हम सब जानते हैं कि आज कोई सुरक्षित नहीं है। कोई भी बीमार हो सकता है, किसी को कहीं भी संक्रमण अपनी चपेट मे ले सकता है। एक्सीडेंट की तो पूछिए मत!

सो ये बात तो क्लेयर है की हम कोई फैंटम ना हीं सुपर मैन हैं ना सुपर वुमन ये गलतफहमी से दूर रहें कि “हमे कुछ नहीं होगा” आज की परिस्थिति हमारा सुपर सेंस तो यही कहता कि जल्द हेल्थ इन्श्योरेन्स कवर ले लें ताकि कम प्रीमियम पड़े।

अगर आप 40 साल की उम्र से पहले ये हेल्थ इनश्योरेंस कवर लेते हैं तो आपको बिना शर्त के मैक्सिमम फायदा मिल सकता है।

2. कोरोना जैसे वायरस का अकस्मिक आघात

अगर कोरोना जैसे खतरनाक परिवार का विषाणु अगर बेलगाम हो जाये तो हम परिणाम देख रहें हैं…

फिलहाल आप कोविड-19 की से तो परिचित हो चुके हैं। ऐसे बहुत सारे दुर्दांत वायरस जो हमारी देह की दहलीज लांघ कर हमे रोग ग्रसित करना चाहता है, बस एक असावधानी ही काफी है। 

वैसे दुनिया पहले से H2N2, एशियन फ्लू, रैबीज, इबोला, HIV, Smallpox,रोटा वायरस, सार्स, मर्स और न जाने कितने वायरस की भयावहता झेल रही है ।

ऐसे काल मे एक सम्पूर्ण हेल्थ इनश्योरेंस की सख्त जरुरत है जिससे हम बेफिक्र होकर बेस्ट मेडिकल सुविधा ले सकें बिना खर्चों की चिंता कीये।  

3. फ्री हेल्थ चेक-उप की सुविधा

हेल्थ चेक उप हमे अगाह करते रहता है

हर कोई युवराज सिंह जैसा लकी नहीं होता।  उनकी कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का पता शुरुआती दिनों में सिर्फ इसलिए लग पाया था क्योंकि उसकी नियमित हेल्थ चेक उप होती थी। वह एक खिलाड़ी था।  

हमारे यहाँ तो जब तक कि कोई बड़ी विपदा न आ जाए हम हम अपना हेल्थ चेक-उप टालते रहते हैं। फैन्टम जो ठहरे! हम यहाँ भी जुगाड़ कर लेते हैं ये जानते हुए कि रेगुलर हेल्थ चेक-उप हमें दुर्दांत रोगों की आहट पहले दे देती है पर हम इगनोर करते रहते है। 

हेल्थ इनश्योरेंस आपको फ्री हेल्थ चेक-उप की सुविधा देती है ताकि आप प्रीपेयर्ड रहें।

4 अव्यवस्थित 24/7 की जीवन-शैली

आज हम अपने आप को 24/7 वाले जनरेशन कहलाने में गौरवान्वित महसुस करते है पर ताज़ा सर्वेक्षण साफ-साफ इंगित करता है कि ये भागमभाग की जिंदगी हमें धीमे-धीमे बीमार और बीमार कर रही है। फिजिकल एक्टिविटी हमारी प्राइऑरटी में नीचे जा रही है।  

खान-पान की तो अलग दुविधा है। मिडल क्लास मे तो चाइनीज, कॉन्टिनेंटल और इटैलियन फूड खाना स्टैटस सिंबल बनता जा रहा है।

इंस्टाग्राम पर पोस्ट जो करना हैं #हैविंग_इटैलियन_फूड पेट अपना दुखड़ा भी नहीं कह पा रहा दिन ब दिन हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ती जा रही हैं। नए नए रोग पनप रहे हैं।  आए दिन हमे अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

ये सब आकस्मिक खर्चे का जंजाल है, इसके लिए जरूरी है कि हमारे पास स्वास्थ्य बीमा हो जो बुरे वक्त मे काम आ सके।   

5. आस-पास का बढ़ता प्रदूषण

WHO के हाल के रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण हमारे फेफड़े, हृदय और हमारे सारे नाज़ुक अंगों पर अपना खतरनाक कुप्रभाव डाल रही है। जाने अनजाने कितने तरह के प्रदूषण के संपर्क मे हम आते रहते हैं।

भारत मे हर साल 18 लाख लोगों की मौत का जिम्मेदार ये वायु प्रदूषण है। विशेषज्ञ तो यहाँ तक मानते हैं की दिल्ली मे अकेले 30 हजार प्रीमेच्योर मौतों के लिए ये प्रदूषण हीं जिम्मेदार हैं। आकड़े पुराने है पर डरावने हैं।

हम दिन व दिन नये रोगों के प्रति इक्स्पोज़ होते जा रहें हैं ऐसे में प्रीपेयर्ड रहना हमारी मज़बूरी और जरूरत दोनो बन गई है।

6. हृदय व कैंसर रोगियों की बढ़ती तदात

आंकड़ों की मानें तो पिछले 25 बरस में हृदय रोगियों की तादाद में 50 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. एक स्टडी के अनुसार 75 वर्ष की उम्र से पहले कैंसर से मौत का जोखिम (मोर्टेलिटी रेट) पुरुषों में 7.34 फ़ीसदी और महिलाओं में 6.28 फ़ीसदी तक होता है। आज भारत में होने वाली 61% मौतों के लिए असंक्रामक बीमारियाँ (NCD – Non-Communicable Disease), जैसे कैंसर, डायबिटीज और हृदय रोग जिम्मेवार है।

लोगों की निष्क्रिय जीवनशैली और खानपान की खराब आदतों के चलते हृदय रोग से पीड़ित लोगों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। कुछ वर्ष पहले तक, 50 से 60 वर्ष के बीच की उम्र वाले लोगों के लिए हृदय रोग चिंता का विषय हुआ करता था, लेकिन अभी 20 से 40 वर्ष की आयु वर्ग वाले लोगों में भी यह दिखना शुरू होने लगा है।

भारत में निजी अस्पतालों में सामान्य हृदय रोग के उपचार पर 1,50,000 रुपए से 6,00,000 रुपए का खर्च आता है और दवाइयों पर आने वाला मासिक खर्च अलग है।

हृदय रोग के बढ़ते खतरों के मद्देनजर कार्डियक प्लान वाली बीमा पॉलिसी है जरूरी हो गई है।

7. फाइनेंशियल ब्रेक डाउन से सुरक्षा

याद रहे हॉस्पिटल किसी तरह का मोल भाव या नेगोशिएशन नहीं करती है। जिस तरह से हेल्थ सर्विस में सुधार आ रहा है सुविधाएं भी बहुत महंगी होती जा रही है। हम सबने अपने आसपास खेत-जेवर बिकते देखे हैं। ख़ुशहाल परिवार को  अचानक आये मेडिकल विपदाओं के कारण पैसे के लिए बिलखते देखे हैं।
हेल्थ इन्सुरंस उन्ही अप्रत्याशित खर्चों का ख्याल रखती है जो अचानक अस्पताल में भर्ती होने से उत्पन्न होता है। फाइनेंसियल एक्सपर्ट की एक हीं सलाह होती है की आप आपने सालाना आय का 2% हेल्थ इनश्योरेंस के लिए व्यय करें।  

इंश्योरेंस कंपनियों का हर बड़े-छोटे हॉस्पिटलों से टाई-अप होता है, अगर आपके पास हेल्थ इंश्योरेंस है तो आप अपना उपचार कहीं भी करा सकते है वो भी कैशलेस सुविधा के साथ। आपको इलाज के लिए पैसों की चिंता करने की जरूरत नहीं होती। आपके हॉस्पिटल बिल के लिए नेगोशिएशन करने की जरूरत नहीं होती ये काम आपकी इन्श्योरेन्स कंपनी करती है.  आप बेफिक्र होकर अपना इलाज करा सकते हैं।


हेल्थ इंश्योरेंस में मरीज को हॉस्पिटल लाने ले जाने में एंबुलेंस का जो  खर्च भी कवर होता है। 

हाँ इन सब के साथ हेल्थ इनश्योरेंस के लिए जो प्रीमियम का भुगतान किया जाता है, उस पर आयकर भुगतान अधिनियम की धारा 80डी के तहत टैक्स में छूट मिलती है।

त्रुटियों के लिए अग्रीम माफी –
इसमें बहुत सारी त्रुटियां हो सकती है पर मैंने अपनी कपैसिटी मे ईमानदार कोशिश की है और आशा करता हूं कि आप अपने कमेंट से मुझे और सुझाव देंगे। आप से आग्रह है की इसे समझे और इस बात से अपने आसपास के लोगों को अवेयर करें। मेरी यह कोशिश है कि समाज में इनश्योरेंस के बारे में अवरेनेस बढ़े इसलिए मैं बोलचाल की भाषा उपयोग करता हूँ . मैं कोई लल्लनटॉप नहीं हूँ और न इनश्योरेंस का ज्ञाता। बस जितना जानता हूँ वो आप तक बढ़ा दिया। अच्छा लगे तो आप दुसरो को बढ़ा दे बस यही मेरी चाहत है. मैं चाहता हूँ की इस लॉक डाउन में हम और स्टीरिओ टाइप के ज्ञान से थोड़े आगे बढ़े कुछ नया सीखे कुछ नया जाने

धन्यवाद।

#Disclaimer – Opinions expressed are solely my own or drawn from innumerable centers of culture & lore. It do not express the views or opinions of my employer.