तेरी आज़ादी – शशि कुमार आँसू

क्या पा ली तेरी तूने आज़ादी!
क्या छिन के ली तूने आज़ादी?

तय तो करो कैसी हो आज़ादी!
किस बात की चाहिए आज़ादी?

क्या ख़ुद की बंदगी से आज़ादी !
या मन की गंदगी से आज़ादी !!

क्या बेसुमार नफरतों से आज़ादी !
या दकियानूसी सोचों से आजादी!!

क्या तेरी झूठे वादों से आज़ादी !
या तेरी टुच्ची इरादों से आज़ादी !!

क्या तेरी कर्तव्यहीनता से आज़ादी !
या तेरी बेसुमार कृतघ्नता से आज़ादी !!

क्या तेरी अनुशासनहीनता से आज़ादी!
या तेरी कोरी कपट बहानो से आज़ादी!!

क्या राह मे बिछी बाधाओं से आज़ादी !
या मेहनतकश आशाओं से आज़ादी !!

क्या पतंग का अपने डोर से आज़ादी!
या उसके बाधाओं के छोर से आजादी!!

कहते हो छिन के लेंगे मेरी आज़ादी?
कहो क्या पा ली ये सब से आज़ादी!!

लेखक – शशि कुमार आँसू @shashiaansoo

घर की याद – भवानी प्रसाद मिश्र

आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,
रात-भर गिरता रहा है,
प्राण मन घिरता रहा है,

अब सवेरा हो गया है,
कब सवेरा हो गया है,
ठीक से मैंने न जाना,
बहुत सोकर सिर्फ़ माना—

क्योंकि बादल की अँधेरी,
है अभी तक भी घनेरी,
अभी तक चुपचाप है सब,
रातवाली छाप है सब,

गिर रहा पानी झरा-झर,
हिल रहे पत्ते हरा-हर,
बह रही है हवा सर-सर,
काँपते हैं प्राण थर-थर,

बहुत पानी गिर रहा है,
घर नज़र में तिर रहा है,
घर कि मुझसे दूर है जो,
घर ख़ुशी का पूर है जो,

घर कि घर में चार भाई,
मायके में बहिन आई,
बहिन आई बाप के घर,
हायर रे परिताप के घर!

आज का दिन दिन नहीं है,
क्योंकि इसका छिन नहीं है,
एक छिन सौ बरस है रे,
हाय कैसा तरस है रे,

घर कि घर में सब जुड़े हैं,
सब कि इतने तब जुड़े हैं,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,

और माँ बिन-पढ़ी मेरी,
दुःख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर,

माँ कि जिसकी स्नेह-धारा
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता।

और पानी गिर रहा है,
घर चतुर्दिक् घिर रहा है,
पिताजी भोले बहादुर,
वज्र-भुज नवनीत-सा उर,

पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी दौड़ जाएँ,
जो अभी भी खिल-खिलाएँ,

मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें,
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता,

आज गीता पाठ करके,
दंड दो सौ साठ करके,
ख़ूब मुगदर हिला लेकर,
मूठ उनकी मिला लेकर,

जब कि नीचे आए होंगे
नैन जल से छाए होंगे,
हाय, पानी गिर रहा है,
घर नज़र में तिर रहा है,

चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे,
नज़र उनकी पड़े होंगे।

पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवें का नाम लेकर,

पाँचवाँ मैं हूँ अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,
पिताजी कहते रहे हैं,
प्यार में बहते रहे हैं,

आज उनके स्वर्ण बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेटे,
क्योंकि मैं उन पर सुहागा
बँधा बैठा हूँ अभागा,

और माँ ने कहा होगा,
दुःख कितना बहा होगा
आँख में किस लिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी,

वह तुम्हारा मन समझ कर,
और अपनापन समझ कर,
गया है सो ठीक ही है,
यह तुम्हारी लीक ही है,

पाँव जो पीछे हटाता,
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेगे और बच्चे,

पिताजी ने कहा होगा,
हाय कितना सहा होगा,
कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,
धीर मैं खोता, कहाँ हूँ,

गिर रहा है आज पानी,
याद आता है भवानी,
उसे थी बरसात प्यारी,
रात-दिन की झड़ी झारी,

खुले सिर नंगे बदन वह,
घूमता फिरता मगन वह,
बड़े बाड़े में कि जाता,
बीज लौकी का लगाता,

तुझे बतलाता कि बेला
ने फलानी फूल झेला,
तू कि उसके साथ जाती,
आज इससे याद आती,

मैं न रोऊँगा,—कहा होगा,
और फिर पानी बहा होगा,
दृश्य उसके बाद का रे,
पाँचवे की याद का रे,
भाई पागल, बहिन पागल,
और अम्मा ठीक बादल,
और भौजी और सरला,,
सहज पानी, सहज तरला,

शर्म से रो भी न पाएँ,
ख़ूब भीतर छटपटाएँ,
आज ऐसा कुछ हुआ होगा,
आज सबका मन चुआ होगा।

अभी पानी थम गया है,
मन निहायत नम गया है,
एक-से बादल जमे हैं,
गगन-भर फैले रमे हैं,

ढेर है उनका, न फाँकें,
जो कि किरने झुकें-झाँकें,
लग रहे हैं वे मुझे यों,
माँ कि आँगन लीप दे ज्यों,

गगन-आँगन की लुनाई,
दिशा के मन से समाई,
दश-दिशा चुपचार है रे,
स्वस्थ की छाप है रे,

झाड़ आँखें बंद करके,
साँस सुस्थिर मंद करके,
हिले बिन चुपके खड़े हैं,
क्षितिज पर जैसे जड़े हैं,

एक पंछी बोलता है,
घाव उर के खोलता है,
आदमी के उर बिचारे,
किस लिए इतनी तृषा रे,

तू ज़रा-सा दुःख कितना,
सह सकेगा क्या कि इतना,
और इस पर बस नहीं है,
बस बिना कुछ रस नहीं है,

हवा आई उड़ चला तू,
लहर आई मुड़ चला तू,
लगा झटका टूट बैठा,
गिरा नीचे फूट बैठा,

तू कि प्रिय से दूर होकर,
बह चला रे पूर होकर
दुःख भर क्या पास तेरे,
अश्रु सिंचित हास तेरे!

पिताजी का वेश मुझको,
दे रहा है क्लेश मुझको,
देह एक पहाड़ जैसे,
मन कि बड़ का झाड़ जैसे

एक पत्ता टूट जाए,
बस कि धारा फूट जाए,
एक हल्की चोट लग ले,
दूध की नद्दी उमग ले,

एक टहनी कम न होले,
कम कहाँ कि ख़म न होले,
ध्यान कितना फ़िक्र कितनी,
डाल जितनी जड़ें उतनी!
इस तरह का हाल उनका,

इस तरह का ख़याल उनका,
हवा, उनको धीर देना,
यह नहीं जी चीर देना,
हे सजीले हरे सावन,

हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें,

मैं मज़े में हूँ सही है,
घर नहीं हूँ बस यही है,
किंतु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है,

किंतु उससे यह न कहना,
उन्हें देते धीर रहना,
उन्हें कहना लिख रहा हूँ,
मत करो कुछ शोक कहना,

और कहना मस्त हूँ मैं,
कातने में व्यस्त हूँ मैं,
वज़न सत्तर सेर मेरा,
और भोजन ढेर मेरा,

कूदता हूँ, खेलता हूँ,
दुःख डट कर ठेलता हूँ,
और कहना मस्त हूँ मैं,
यों न कहना अस्त हूँ मैं,

हाय रे, ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूँ,
आदमी से भागता हूँ,

कह न देना मौन हूँ मैं,
ख़ुद न समझूँ कौन हूँ मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना,

हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें।

स्रोत:
पुस्तक : मन एक मैली क़मीज़ है (पृष्ठ 25)संपादक : नंदकिशोर आचार्यरचनाकार : भवानी प्रसाद मिश्रप्रकाशन : वाग्देवी प्रकाशनसंस्करण : 1998

तेरा ख्याल – शशि कुमार आँसू

तेरा जब भी ख्याल आता है…
ख़ुद के नशे में महुए सा टपक जाता हूँ।
अक्खड़ प्रेमी सा चलता हूँ… लड़खड़ाता हूँ।

तेरा जब भी ख्याल आता है…
सुर्ख उढ़हूल सा लहलहा के खिल जाता हूँ।
मोगरे की खुशबू सा फिज़ा मे बिखर जाता हूँ।

तेरा जब भी ख्याल आता है…
सुनसान मेरे बस्ती मे गाता हूँ गुनगुनाता हूँ।
भीगी बारिश मे मोरनी सा चहचहाता हूँ।

तेरा जब भी ख्याल आता है…
खुले आसमान मे सैर पर चला जाता हूँ।
चाँद को देखता हूँ मंद मंद मुस्कुराता हूँ।

तेरा जब भी ख्याल आता है…
तेरी असीम यादों मे गुम हो जाया करता हूँ।
थोड़ा ठहरता हूँ फिर गुमसुम हो जाता हूँ।

तेरा जब भी ख्याल आता है…
मैं बस टूटता हूँ, बिखरता हूँ, छटपटाता हूँ…
तेरी यादों मे मैं तुझे हीं ओढ़ता बिछाता हूँ।

तेरा जब भी ख्याल आता है…
तेरे एहसास से हीं आह्लादित हो जाता हूँ
खुशबू में तेरी डूब प्रेम की पराकाष्ठा मैं पाता हूँ।

लेखक :: शशि कुमार आँसू @shashiaansoo


मैं जो हूँ :भवानी प्रसाद मिश्र की कविता

मैं जो हूँ
मुझे वही रहना चाहिए
यानी
वन का वृक्ष
खेत की मेड़
नदी की लहर
दूर का गीत
व्यतीत
वर्तमान में
उपस्थित भविष्य में
मैं जो हूँ मुझे वही रहना चाहिए
तेज़ गर्मी
मूसलाधार वर्षा
कड़ाके की सर्दी
ख़ून की लाली
दूब का हरापन
फूल की जर्दी
मैं जो हूँ
मुझे अपना होना
ठीक ठीक सहना चाहिए
तपना चाहिए
अगर लोहा हूँ
हल बनने के लिए
बीज हूँ
तो गड़ना चाहिए
फल बनने के लिए
मैं जो हूँ
मुझे वह बनना चाहिए
धारा हूँ अंत:सलिला
तो मुझे कुएँ के रूप में
खनना चाहिए
ठीक ज़रूरतमंद हाथों से
गान फैलाना चाहिए मुझे
अगर मैं आसमान हूँ
मगर मैं
कब से ऐसा नहीं
कर रहा हूँ
जो हूँ
वही होने से डर रहा हूँ।

सखि, वे मुझसे कहकर जाते (यशोधरा)

सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?

मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना ?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते ।

सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को, प्राणों के पण में,
हमीं भेज देती हैं रण में –
क्षात्र-धर्म के नाते ।

सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

हु‌आ न यह भी भाग्य अभागा,
किसपर विफल गर्व अब जागा ?
जिसने अपनाया था, त्यागा;
रहे स्मरण ही आते !

सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
पर इनसे जो आँसू बहते,
सदय हृदय वे कैसे सहते ?
गये तरस ही खाते !

सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

जायें, सिद्धि पावें वे सुख से,
दुखी न हों इस जन के दु:ख से,
उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से ?
आज अधिक वे भाते !

सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

गये, लौट भी वे आवेंगे,
कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे,
रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
पर क्या गाते-गाते ?

सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

मैथिलीशरण गुप्त

अभी भी जिंदा हूँ – शशि कुमार आँसू

माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।
पर देख ये सब शर्मिंदा हूँ।।

कहने को बहुत प्रोग्रेसिव हूँ
पर सच में बहुत निगेटिव हूँ।
जब देखता हूँ तेरे आँगन को
मन हीं मन बहुत घबराता हूँ।

कोविड से लड़ते सब दुःख सहते,
पथरीले पथ पर अविरल चलते
माँ को ढोते निढाल सपनों को

देख ये सब बहुत शर्मिंदा हूँ।
माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।

कुछ निखट निपोरे प्रयत्नों को
देख कर सियासी सब यत्नो को
सड़क पर चलते धुप में जलते
हालत के मारे हम वतनों को

देख ये सब बहुत शर्मिंदा हूँ।
माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।

ये नुका छिपी और दाव पेंच मे
तिल-तिल कर मरते तेरे रत्नों को
सह और मात के खुराफात मे
गर्त में डूबते का सब संयंत्रो को

देख ये सब बहुत शर्मिंदा हूँ।
माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।

भूखे मदद की गुहार लगाते
सियासत दनों के ताल पर नचते
अपनी कल की राह को तकते
आशाओं का बस एक पुलिंदा हूँ

माँ देख अभी भी जिंदा हूँ।
माँ देख अभी भी जिंदा हूँ।।

©शशि कुमार ‘आँसू’

https://images.app.goo.gl/R4xDtsJrpxbUYT8r7
The 21-day lockdown, which came into force on Wednesday, has triggered an exodus of migrant workers from many cities.Credit – Business Standard Private Ltd. 
Heartbreaking visuals: A little boy fell asleep on a suitcase as his migrant parents take a long journey home from Punjab to Uttar Pradesh https://t.co/HcGEFRCKI4

मैं कैसे तुझको याद करूँ – शशि कुमार आँसू

Simpi Shashi Singh Happy 15th Anniversary

मैं कैसे तुझको याद करूँ,
तुझे देखूं या बात करूँ।
मैं कैसे तुझे याद करूँ।।

वो बातेँ जब याद आती है
रोयां रोयां खील जाता है

मैं तन्हा सूरज तकता था!
एक रोज़ अचानक तू आयी!
क्या उस पल का अहसास धरूँ
मैं कैसे तुझे याद करूँ।।

कैसे मैं तुझको याद करूँ,
पंद्रह बसंत लो अब बीत गये,
जब मिले थे कितने कच्चे थे!
हाँ-हाँ शायद हम बच्चे थे।

अब कैसी हो क्या बात करूँ!
बस वैसी हो जिसके साथ रहूँ ।

तेरी आँखे आज भी वैसी है
बस कच्ची कैरी की जैसी है।
इठलाती हुई बलखाती हुई
महकाती हुई दमकाती हुई।

जब-जब तुम काज़ल करती हो
तन मन घायल हो जाता है,

बन ठन कर जब तुम चलती हो
मन फिर पागल हो जाता है।

मैं कैसे तुझको याद करूँ,
मुस्काती हुई, भरमाती हुई,
कभी गाती हुई , शर्माती हुई,
कभी धीरे से सुर्ख होठों से
‘आँसू’ कहके बुलाती हुई

जब जब बाल में रुके बूंदों को,
बल खाके तुम झटकती हो,
सच कहता हूँ मर जाता …
जब मुड़कर तुम मुस्काती हो।

मैं कैसे तुझको याद करूँ,
पल-पल में तुम रग-रग में तुम
नींदों में तुम सपनों में तुम,
मैं चाहता तुमको
सिर्फ हूँ।
में माँगता तुमको
सिर्फ हूँ।

मैं कैसे तुझको याद करूँ,
तुमसे लड़ूँ या तुझे प्यार करूँ,
किस आनंद का साक्षात्कार करूँ
।।

तेरी बातें तेरे गोरे गाल सी है,
गुस्से में वो सुर्ख लाल सी है।
मैं गेंदा जैसा खीला हुआ,
तुम गुलमुहर कमाल सी है।

तुम कहो तुझे मैं क्यूँ याद करूँ!
बस तेरे साथ जीऊँ रोमांस करूँ
हर क्षण हर पल तेरे साथ रहूँ
तेरे साथ जीऊँ तेरे साथ मरूँ।


© शशि कुमार ‘आँसू ‘

I Love You SIMPI SINGH

Happy 15th Anniversary
Simpi Shashi Singh & Shashi Kumar Aansoo

क्या थे क्या हो गये हैं हम – प्रभाकर “प्रभू”

मन कहीं टिकता नहीं
भागता है रुकता नहीं
दिन रात जैसे भाग रहा
और उम्मीदें साज रहा
पर कर्म अब भी शून्य है
क्या पाप है क्या पुण्य है
अगर ये भी ज्ञात हो
कि जीत हो या मात हो
ये कर्म ही सर्वोपरि है
और मेहनत ही बड़ी है
जागना था पर सो गये हैं हम
क्या थे क्या हो गये हैं हम
हर निशा संकल्प लेकर
और नयन को स्वप्न देकर
धोखा ही देते आयें हैं
फिर ख़ुद को ही बचायें हैं
कल हुआ तो कल होगा
सफल या विफल होगा
पर मन को समझाये कौन
बेबस यूँ पड़ा है मौन
किस्मत को ही कोसना है
पर ख़ुद को नहीं टोकना है
काटना है जो बो गये हैं हम
क्या थे क्या हो गये हैं हम
मन से जिस दिन निकल गये
समझो राह पकड़ लिये
बस आगे बढ़ते जाना है
और पास नहीं ठिकाना है
जितना दूर तुम जाओगे
ये दुनिया पास तुम पाओगे
जब रक्त पसीना बन जायेगा
तब मन पे क़ाबू हो जायेगा
पर ये सोच के ना रुक जाना
और लौट के मन को ना आना
जैसा चाहा ना हुआ तो फिर
दुनिया मुझपर हँसेगी फिर
कल को किसने देखा है
तुमको किसने रोका है
आज तुम्हारी बारी है
कर लो जो तैयारी है
हँसते हैं तो हँसने दो
जो कहते हैं कहने दो
पर तुमने जो ठाना है
उसको कर दिखाना है
बातों बातों में खो गये हैं हम
क्या थे क्या हो गये हैं हम
©प्रभाकर “प्रभू”

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मज़दूर हूँ मैं – प्रभाकर “प्रभू”

आज के हालात पर एक कविता जो की प्रभाकर कुमार ने लिखी है
कृप्या पूरा पढ़ें और शेयर जरूर करें।

ना बेबस और ना लाचार हूँ
हाँ मगर गरीबी पे सवार हूँ
मेहनत ही अपना परिचय है

पर ये अच्छा नहीं समय है
वर्षों का दस्तूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

जो लहू हमारा लगता है
तो पसीना आपको दिखता है

बहुत किया है हमने काम
और बदले में दिया सलाम
भूख के हाथों मज़बूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

हमारा ना कोई सपना है
कब जीना कब मरना है
ठिकाना अपना एक नहीं
जीने का मौक़ा अनेक नहीं

मरा हुआ जीवित जरूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

मन में एक सवाल है साहेब
ये कैसा बवाल है साहेब
घर परिवार को छोड़ा है
कसमें वादे सब तोड़ा है
एक सपना देकर आया था
एक वक़्त ही रोटी खाया था
एक साड़ी एक खिलौना है
जिसको घर तक ढोना है
पास नहीं है मेरे पैसे
तो फिर घर जाऊँगा कैसे
घर मेरे पहुँचा दो साहेब
टिकेट एक करवा दो साहेब
खा रहा हूँ ठोकर कब से
विनती कर रहा हूँ सब से
कोई नहीं मेरी सुनता है
बस दूर रहो ये कहता है
जाने क्या कहती है सरकार
ये भी वो भी है अधिकार

पर शायद उनको दिखता नहीं
और कोई उनको कहता नहीं
देखो पास मेरे क्या आया है
पुलिस का डंडा ही खाया है
गलती क्या है जो मज़दूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

©प्रभाकर “प्रभू” – Writer, Poet, Actor

#petry #कविता #poet #kavyamanjari

मैं वक़्त हूँ फिर न वापस आऊंगा – शशि कुमार आँसू

मै वक्त हूँ फिर न वापस आऊंगा
जब बेला आएगी अलविदा कह जाऊंगा ।

तेरी तुम फिर अब देख लो
कुछ बचा है! तो तुम समेट लो
तुम देख लो क्या लाए थे!
तुम सोच लो क्या पाए लिए!

क्या मिल गया जो ठहर गए!
क्या कर लिया जो यूँ बिफर गए!
तुम किस नगर में ढल गए…
तुम किस डगर को चल दिए।

तुम किस कदर के ढीठ हो
ना जीत की तुझमे आग है,
ना प्रीत की तुझमे राग है,
सांत्वना बस अपरम्पार है।

तुम सोचते हो क्या हो जाएगा!
जो नसीब में है सब मिल जाएगा!
वो क्या है जिस पर गुमान है!
क्या अंतिम तेरी यही उड़ान है!

अंगीकार तुझे इस बात का हो
की तुम शुन्य पर सवार हो।
बहानों से भरे तेरे तिलिस्म मे,
तुम आत्ममुग्धता के शिकार हो।

तेरे बाजुओं में क्या दम नहीं
या जीत का अवचेतन नहीं!
जब सब छोड़कर तुम जाओगे!
किस बात पर आह्लाद पाओगे!!

तुम्हें किस कमी की शिकायत है?
जो नहीं मिला, तो नहीं मिला
जो नहीं किया, तो नहीं किया
ये सोच कर तु गिला न कर।

सब रिवायतों को तुम तोड़कर
सब जकड़नो को तुम छोड़ कर
जो पल बचा उसे सब जोड़ कर
प्रतिज्ञा तुम अब कठोर कर!

प्रचंड धीर अब बनेगा तुम।
न थकेगा तुम, न रुकेगा तुम।
कमजोरियों को तज़ कर सब,
श्रम की पराकाष्ठा करेगा तुम।।

मै वक्त हूँ फिर न वापस आऊंगा
नादान हो! मुझे जुमला समझ लो!
सुजान हो! मेरे इश्क़ मे पड़ लो।
मै वक्त हूँ नाम तेरा स्वर्णाक्षर से लिखऊँगा।

कविता By शशि कुमार ‘आँसू’

संघर्ष तेरा हो तो क्यूँ नहीं वो राम सा हो
प्रयत्न तेरा हो तो क्यूँ नहीं वो श्याम सा हो।

#Disclaimer – Opinions expressed are solely my own or drawn from innumerable centers of culture & lore. It do not express the views or opinions of my employer.

माँ! तुम होती तो कैसा होता – शशि कुमार आँसू

माँ! तुम होती तो कैसा होता
आज मैं भी इठला रहा होता।

मैंने हर जगह ढूंढा तुमको
कभी तेरे किताबों के पन्नों मे
कभी तेरे छोड़ गए गहनों मे
कभी तेरे अधूरे लिखे लब्ज़ो में
कभी तेरी मनमोहनी किस्सों मे ।

मैंने हर जगह ढूंढा तुमको
पर तुम मुझे कहीं ना मिली!

क्या था जो मुझको तज़ गयी
क्या बस एक दिवस का साथ था!
तुम यूँ क्यूँ पंचतत्तव मे बिखर गयी!
किस भरोसे छोड़ तुम ऊपर चली गयी!

क्या कुछ मातृत्व से बेहतर मिल गया
क्यों काल तुम्हें मुझसे यूँ छीन गया!
भगवान थे! रुक जाते वो!
कहती तो शायद झूक जाते वो

क्या उनको ये मालूम न था?
उनके रचे इस लोक में,
कैसे माँ के बिन जिऊँगा मैं
तानो से भरे बिघ्न दंश में,
कितनी रुदन सहूंगा मैं।

माँ! तुम ही अब कहो यहाँ
किस किस को माँ कहूँगा मैं।

क्या मुझमें कोई कमी रही
क्या मुझसे तुम नाराज थी
बस जन्म दिन और चल दिये
क्या देखने की जिद्द न थी!
या दिखलाने की मर्म न था!

माँ! तुम होती तो कैसा होता
माँ! तुम होती तो कैसा होता

माँ! ये कौन सा नसीब है!
न तु है! न तेरी तस्वीर है!
शिकवा है पर उस रब से है
माँ! तुझसे कोई गीला नहीं।

तुम लड़ गयी होगी काल से
जब मैं भी तुझे मिला नहीं।

माँ! मैं सबसे अक्सर पूछता हूँ
तेरी शक्लों सूरत कैसी थी?
बस लोग अक्सर कहते हैं,
तेरी आंखे बस मेरी जैसी थी।

यूं तो लबरेज थी पानी से पर
बरसात में नाचती मोरनी सी थी।

माँ! तुम होती तो अच्छा होता
सच! मैं आज इठला रहा होता।

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो – निदा फ़ाज़ली

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो

इधर उधर कई मंज़िल हैं चल सको तो चलो
बने बनाये हैं साँचे जो ढल सको तो चलो

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिराके अगर तुम सम्भल सको तो चलो

यही है ज़िन्दगी कुछ ख़्वाब चन्द उम्मीदें
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

हर इक सफ़र को है महफ़ूस रास्तों की तलाश
हिफ़ाज़तों की रिवायत बदल सको तो चलो

कहीं नहीं कोई सूरज, धुआँ धुआँ है फ़िज़ा
ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो

@ निदा फ़ाज़ली

सतपुड़ा के घने जंगल – भवानीप्रसाद मिश्र

सतपुड़ा के घने जंगल।
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

झाड ऊँचे और नीचे,
चुप खड़े हैं आँख मीचे,
घास चुप है, कास चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है।
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
ऊँघते अनमने जंगल।

सड़े पत्ते, गले पत्ते,
हरे पत्ते, जले पत्ते,
वन्य पथ को ढँक रहे-से
पंक-दल मे पले पत्ते।
चलो इन पर चल सको तो,
दलो इनको दल सको तो,

ये घिनौने, घने जंगल
नींद में डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

अटपटी-उलझी लताएँ,
डालियों को खींच खाएँ,
पैर को पकड़ें अचानक,
प्राण को कस लें कपाएँ।
साँप सी काली लताएँ
बला की पाली लताएँ

लताओं के बने जंगल
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

मकड़ियों के जाल मुँह पर,
और सर के बाल मुँह पर
मच्छरों के दंश वाले,
दाग काले-लाल मुँह पर,
वात-झन्झा वहन करते,
चलो इतना सहन करते,

कष्ट से ये सने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

अजगरों से भरे जंगल।
अगम, गति से परे जंगल
सात-सात पहाड़ वाले,
बड़े छोटे झाड़ वाले,
शेर वाले बाघ वाले,
गरज और दहाड़ वाले,

कम्प से कनकने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

इन वनों के खूब भीतर,
चार मुर्गे, चार तीतर
पाल कर निश्चिन्त बैठे,
विजनवन के बीच बैठे,
झोंपडी पर फूस डाले
गोंड तगड़े और काले।

जब कि होली पास आती,
सरसराती घास गाती,
और महुए से लपकती,
मत्त करती बास आती,
गूँज उठते ढोल इनके,
गीत इनके, बोल इनके

सतपुड़ा के घने जंगल
नींद मे डूबे हुए से
उँघते अनमने जंगल।

जागते अँगड़ाइयों में,
खोह-खड्डों खाइयों में,
घास पागल, कास पागल,
शाल और पलाश पागल,
लता पागल, वात पागल,
डाल पागल, पात पागल
मत्त मुर्गे और तीतर,
इन वनों के खूब भीतर।

क्षितिज तक फ़ैला हुआ-सा,
मृत्यु तक मैला हुआ-सा,
क्षुब्ध, काली लहर वाला
मथित, उत्थित जहर वाला,
मेरु वाला, शेष वाला
शम्भु और सुरेश वाला
एक सागर जानते हो,
उसे कैसा मानते हो?

ठीक वैसे घने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

धँसो इनमें डर नहीं है,
मौत का यह घर नहीं है,
उतर कर बहते अनेकों,
कल-कथा कहते अनेकों,
नदी, निर्झर और नाले,
इन वनों ने गोद पाले।

लाख पंछी सौ हिरन-दल,
चाँद के कितने किरण दल,
झूमते बन-फूल, फलियाँ,
खिल रहीं अज्ञात कलियाँ,
हरित दूर्वा, रक्त किसलय,
पूत, पावन, पूर्ण रसमय

सतपुड़ा के घने जंगल,
लताओं के बने जंगल।

Disclaimer : ये कविता भारतीय काव्य की सार्वभौमिकता को संकलित करने के उद्देश्य से विशुद्ध अव्यावसायिक रूप मे यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

नमस्ते सदा वत्सले

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥१॥

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयम्
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये।

अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम्
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्णमार्गम्
स्वयं स्वीकृतं नः सुगंकारयेत्॥२॥

समुत्कर्ष निःश्रेयसस्यैकमुग्रम्
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्राऽनिशम्।

विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम्
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥३॥

Credit :Namaste Sada Vatsale Matribhume | RSS | Akshay Pandya | Sushant Trivedi

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे, त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे, पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥ १॥

हे प्यार करने वाली मातृभूमि! मैं तुझे सदा (सदैव) नमस्कार करता हूँ। तूने मेरा सुख से पालन-पोषण किया है।

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता, इमे सादरं त्वाम नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं, शुभामाशिषम देहि तत्पूर्तये।

हे महामंगलमयी पुण्यभूमि! तेरे ही कार्य में मेरा यह शरीर अर्पण हो। मैं तुझे बारम्बार नमस्कार करता हूँ।

अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम, सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्,
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं, स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत्॥ २॥

हे सर्वशक्तिशाली परमेश्वर! हम हिन्दूराष्ट्र के अंगभूत तुझे आदरसहित प्रणाम करते हैं। तेरे ही कार्य के लिए हमने अपनी कमर कसी है। उसकी पूर्ति के लिए हमें अपना शुभाशीर्वाद दे।

समुत्कर्षनिःश्रेयसस्यैकमुग्रं, परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा, हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्राऽनिशम्।

हे प्रभु! हमें ऐसी शक्ति दे, जिसे विश्व में कभी कोई चुनौती न दे सके, ऐसा शुद्ध चारित्र्य दे जिसके समक्ष सम्पूर्ण विश्व नतमस्तक हो जाये, ऐसा ज्ञान दे कि स्वयं के द्वारा स्वीकृत किया गया यह कंटकाकीर्ण मार्ग सुगम हो जाये।

विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्, विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं, समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥ ३॥

॥ भारत माता की जय॥

उग्र वीरव्रती की भावना हम में उत्स्फूर्त होती रहे जो उच्चतम आध्यात्मिक सुख एवं महानतम ऐहिक समृद्धि प्राप्त करने का एकमेव श्रेष्ठतम साधन है। तीव्र एवं अखंड ध्येयनिष्ठा हमारे अंतःकरणों में सदैव जागती रहे।तेरी कृपा से हमारी यह विजयशालिनी संघठित कार्यशक्ति हमारे धर्म का सरंक्षण कर इस राष्ट्र को वैभव के उच्चतम शिखर पर पहुँचाने में समर्थ हो। भारत माता की जय ![1]

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना है। सम्पूर्ण प्रार्थना संस्कृत में है केवल इसकी अन्तिम पंक्ति (भारत माता की जय!) हिन्दी में है। इसे सर्वप्रथम २३ अप्रैल १९४० को पुणे के संघ शिक्षा वर्ग में गाया गया था। यादव राव जोशी ने इसे सुर प्रदान किया था। संघ की शाखा या अन्य कार्यक्रमों में इस प्रार्थना को अनिवार्यतः गाया जाता है और ध्वज के सम्मुख नमन किया जाता है।

साभार – https://hi.wikipedia.org/wiki/नमस्तेसदावत्सले
http://rss.org/

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग – फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है

तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए

जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

पुस्तक : Nuskha Hai Wafa (पृष्ठ 61)undefined


Disclaimer : ये नज़्म भारतीय काव्य की सार्वभौमिकता को एक जगह संकलित करने के उद्देश्य से विशुद्ध अव्यावसायिक रूप मे यहाँ प्रस्तुत किया गया है

वो नही मिला तो मलाल क्या जो गुज़र गया सो गुज़र गया – बशीर बद्र

मैंने कुछ ज्यादा पढ़ा नहीं और ज्यादा सुना भी नहीं पर जब जब सुना मैं मंत्रमुग्ध सा होता रहा। मैं शायद हीं किसी शायर को जान पाया और अब दिली ख्वाहिश है की उन सबों को पढ़ूँ और जहां जहां रत्न पड़े है उसे आत्मसात करता रहूँ ।

ये गज़ल बशीर बद्र ने लिखी है और मुझे बेहद पसंद है जो नहीं मिला उसका मलाल क्या जो गुज़र गया वो गुज़र गया. किस्सा बहुत है ज़िन्दगी की चलो पढ़ते हैं और आगे बढ़ते हैं.

आज कल सारा जहाँ लॉक डाउन के वज़ह से सब घर में जकरे पड़े हैं तो चलिए कुछ गोया ग़ज़ल वाजी भी हो जाये जो पसंद है उसे अंकित किये जाएँ.

वो नही मिला तो मलाल क्या, जो गुज़र गया सो गुज़र गया
उसे याद करके ना दिल दुखा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

ना गिला किया ना ख़फ़ा हुए, युँ ही रास्ते में जुदा हुए
ना तू बेवफ़ा ना मैं बेवफ़ा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

तुझे एतबार-ओ-यकीं नहीं, नहीं दुनिया इतनी बुरी नहीं
ना मलाल कर, मेरे साथ आ, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

वो वफ़ाएँ थीं, के जफ़ाएँ थीं, ये ना सोच किस की ख़ताएँ थीं
वो तेरा हैं, उसको गले लगा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

वो ग़ज़ल की कोई किताब था , वो गुलों में एक गुलाब था
ज़रा देर का कोई ख़्वाब था, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

मुझे पतझड़ों की कहानियाँ, न सुना सुना के उदास कर
तू खिज़ाँ का फूल है, मुस्कुरा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

वो उदास धूप समेट कर कहीं वादियों में उतर चुका
उसे अब न दे मिरे दिल सदा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

ये सफ़र भी किताना तवील है , यहाँ वक़्त कितना क़लील है
कहाँ लौट कर कोई आएगा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

कोई फ़र्क शाह-ओ-गदा नहीं, कि यहाँ किसी को बक़ा नहीं
ये उजाड़ महलों की सुन सदा , जो गुज़र गया सो गुज़र गया

कोरोना! तुम कल आना – शशि कुमार आँसू

आज वक़्त यकीं से आगे निकलना चाहता है।
एक कोरोना सम्पूर्ण सृजन को निगलना चाहता है।।
एक व्याधि इस अलौकिक लोक मे विध्वंस लाना चाहता है।।
एक कोरोना सम्पूर्ण सृजन को निगलना चाहता है।।

ये मुश्किल की घड़ी है, सुरसा मुहँ बाएं खड़ी है!
हर शख़्स बेहाल है, मानवता बेसुध-बेज़ान पड़ी है।
उपर से ये खूदगर्ज अश्क! हमे हमसे हीं बहाने पर अड़ी है।।

हर तरफ दिल ना-उम्मीद और मन हैरां सा है!
वसुधैव कुटुम्ब स्तब्ध! हर अक्स परेशां सा है!
ऋतम्बरा भी क्षुब्ध है, क्षितिज रुआँसा सा है।
हवा बाहर की कातिल है। हर शख़्स डरा-सहमा सा है!

एक विषाणु देह की दहलीज़ हमारी लांघ कर,
धधकते दिलो की धडकनों पर पहरा लगाना चाहता है।
एक कोरोना सम्पूर्ण सृजन को निगलना चाहता है।।

खिज़ा सुर्ख है इंसा परेशान ज़िंदगी हैरान है !
चीखता मूक नाद है गली-सड़क सब वीरान है
सब कुछ बंद है स्कूल, दफ्तर और न दुकान है ।।

कैसा मंज़र है! सृजन के दरवाजे पर ताला हैं।
हर तरफ सिहरन है खौफ का शाया काला हैं।
सबको सबसे खतरें हैं! फ़िज़ा में कोरोना का जाला हैं।।

वक्त पहिया रोककर, हमारी सब्र का इम्तिहान लेना चाहता है।
बड़ा निर्दयी कातिल है ये हमें हमसे हीं दूर करना चाहता है।
एक कोरोना सम्पूर्ण धरा को काल के गाल में समाना चाहता है ।।
आज वक़्त यकीं से आगे निकलना चाहता है।
एक कोरोना सम्पूर्ण सृजन को निगलना चाहता है।।

मेरी हमनफस, मेरे अज़ीज़, मेरे मोहसिन
तू क्यूँ परेशान है! तू परेशां ना हो।
माना लंबी मुश्किल की हैं इक्कीस रातें, मगर रात हीं तो है!
ये भी गुज़र जायगा, तेरा साथ, मेरे साथ हीं तो है।

हाँ मंज़र खौफनाक है, पर ये सच्चाई नहीं जाने वाली,
यकीं कर खुदा है तो उसकी खुदायी नहीं जाने वाली।।
गर मन में तेरे राम हैं तो दुआ ये तेरी खाली नहीं जाने वाली ।।

गर नजदीकियों की ख्वाहिश है तो अभी की दूरियाँ कबूल कर
कोरोनाकाल से पार पाना है तो ये लॉकडाउन की मजबूरियां मंज़ूर कर ।
स्वच्छता संक्रमण से लड़ने का अंतिम अस्त्र है तो ये अस्त्र पर गुरुर कर ।।

मेरे यार, मेरे दोस्त, मेरे दुश्मन, मेरे हमवतन
इस वीरान हुए वक्त मे तुम गुलमुहर बन जा।
घर पर रह और घर को और गुलजार किए जा।
प्यार है तो प्यार कर, इश्क है तो इज़हार किए जा।।

रोक ले विघ्न-बाण ये जो धमनियों को गलाना चाहता है.
रुक जा! ठहर जा! आज वक़्त! आगे निकलना चाहता है।
एक कोरोना आज सम्पूर्ण सृजन को निगलना चाहता है।।

*** शब्दार्थ
सुरसा – सुरसा रामायण के अनुसार समुद्र में रहने वाली नागमाता थी। सीताजी की खोज में समुद्र पार करने के समय सुरसा ने राक्षसी का रूप धारण कर हनुमान का रास्ता रोका था और उन्हें खा जाने के लिए उद्धत हुई थी।
खिज़ा पतझड़ की ऋतु । अवनति का समय ।
सुर्ख – लाल (जैसे—सुर्ख़ गाल)।
मूक नाद – लाचार शब्द, ध्वनि
वसुधैव कुटुम्ब – सारी पृथ्वी एक परिवार
स्तब्ध – सुन्न, निश्चेष्ट
ऋतम्बरा – सदा एक समान रहने वाली सात्विक और निर्मल बुद्धि।
क्षितिज – Horizon पृथ्वीतल के चारों ओर की वह कल्पित रेखा या स्थान जहाँ पर पृथ्वी और आकाश एक दूसरे से मिलते हुए से जान पड़ते हैं

मैं तेरा आँसू – शशि कुमार आँसू

उसने ये नही किया
इसने वो नही किया
गिला यही रखकर
सारी उम्र बस गिला किया

ये वो कर सकता था…
पर उसने वो नही किया।
पर जिसने भी जो किया,
उसे किसी ने ये नही पूछा
तूने इतना कैसे किया!

यही होना है होता है
दस्तूर है बुजुर्ग कह गए
पर क्या हमने कुछ किया
हाँ शिकवा बहुत किया
ऑंसू न दे किसी को
ख़ुदा से यही दूआ किया।

कोशिश सच मे हज़ार की
न टूटे साथ किसी का
ना रूठे हाथ किसी का
सब सहोदर रहें 
सब अगोदर रहे
नया कल लिख पाए
हर सोच उत्तरोत्तर रहे

फ़क़त मलाल इस बात का है
बस अपने हीं शक करते रहे 
न जाने क्यूं जलते रहे बुझते रहे
हम की तलाश में, मैं-मैं करते रहे
न जाने क्यूं! किसके आड़ में
न सहोदर रहे न अगोदर रहे

हमने तो लानत देखी है
लाज़िम है की हम बोलेंगे
चौदह बरस का बनवास जिया
हर दिन जिसका अरदास किया

सब साख टूटी सब आंगन छोड़ा
वो फिर भी मेरे हो न सके
मैंने तो अपना कर्म  किया
सब को देखा हर धर्म किया
ना मैंने कोई  स्वार्थ रखा
ना मैंने कोई पार्थ रखा

हाँ मैंने सब्र के चाक रखे
जिसपर मेरे कुछ स्वप्न बुने
मैंने भी सफलता पायी है
कितनो वसंत के जाने पर

फ़नकारो के पावँ पखेरे है
तब जाकर ये नेयमत आयी
भूख में कितने दिन बीते
पावँ में कितने छाले आये
न जाने कितने दर भटकें
तब जाकर फ़क़त एक दीद मिली

सब कहते है बस कर्म करो
फल की चिंता से तुम न घुलो
पर ऐसे कैसे हो जाता है
जब बच्चे बड़े हो जाते है
सब जल्दी वह भूल जाते है।

माना जेनरेशन गैप हो जाता है
पर कर्ता तो कर्ता होता है
वह दुश्मन कब बन जाता है

हमने तो सारे प्रयत्न किये
न जाने किते जतन किये
हम मिल जुल कर सब रह लेंगे
इस बात का भी यत्न किये
पर सारे अनुनय बेकार गए

हमने भी अब यह मान लिया
रेखाओं को सब जान लिया
ये रेखाओ की तो मस्ती है
जो मेरे सिरे नही बस्ती है
सब कुछ छीना कुछ कर न सका
अब किससे किसकी बात करें

सब छोड़ गए ताने देकर
निष्ठुर मैं सब सहता गया
बर्दाश्त सबकी करता गया
एक दिन सब ठीक हो जायेगा
ये सोच कर बढ़ता गया।

न जाने सब कब रूठ गए
मेरी किस बात से टूट गए
मैंने तो न ऐसा चाहा था
सबको अपना ही माना था

हाँ जीवन के आपाधापी में
कुछ भूल हुई कुछ पाप हुआ
कुछ छूट गया कुछ टाल दिया
पर यह कैसा अभिशाप हुआ
कि सब जीत गए मैं हार गया।

होता है अक्सर  होता है
जब रेखाएँ धूमिल होती है
तब नाश मनुज पर छाता है।

मेरी तो रेखा थी हीं नही
आते हीं मिटा दिया मैंने
बढ़ते हीं बुझा दिया मैंने

तब रेखाओ की क्या चाल न थी!
जब माँ ने आंखे मुंदी थी।
तब रेखाओ की मज़ाल न थी!
जब पापा ने साथ छोड़ा था।

अब सब ऐसे है तो क्या करिये
आँसू किस्मत में है तो क्यूँ डरिये
चलो फिर से कोशिश हजार करिये
बस सबका ख्याल बेशुमार करिये।

© शशि कुमार आँसू

अब सब ऐसे है तो क्या करिये
आँसू किस्मत में है तो क्यूँ डरिये
चलो फिर से कोशिश हजार करिये
बस सबका ख्याल बेशुमार करिये। – Shashi Kumar ‘Aaansoo’



सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना – पाश

क्या आप #पाश को जानते हैं ! हाँ “अवतार सिंह संधू” इनका पूरा नाम यही है। इनकी हर लिखी पक्ति आज भी शूलगता हुआ शोला है। आज दुनियाँ जैसे भी उन्हे याद रखे पर उनकी रचित हर कविता मे सच्चाई की एक भीषण गंध है जोआपके अंतर्मन को झकझोर कर रख देती है।

आज पाश को जिस भी पक्ष से आप देख लें पर उनकी सारगर्भिता आप झूठला नहीं सकते। उनकी बेहद तल्ख और धारदार पंक्तियाँ पिघले लोहे की भांति आपके हर शय को चीरती हुयी आपके अंतर्मन में लहूलुहान हो चुके हर अनुभति को शब्दों दे देती है। शायद यही कारण है की आज भी उनकी कविता उतनी हीं रेलवन्ट मालूम पड़ती है जितनी कभी वो अपने दौर मे थी।

पाश हमे अक्सर आगाह करते रहे हैं साथ मे प्रेरित भी करते हैं कि आप जिस भी स्थिति मे हों उसे बेहतर करने की जद्दोजहद करते राहनी चाहिए। उनकी रचित एक बेहद लोकप्रिय कविता “मेहनत की लूट” चाहे जिस भी परिस्थिति मे लिखी गई हो पर आज भी उतना ही प्रासांगिक है । हर शब्द वेदना और विद्रोह की भीषण गंध लिए आपको प्रेरित करती है और बेहतर सपने देखने की हिम्मत देती है।

याद रहे, बेहतर कल का निर्माण आज के बेहतर सपनों से होती है और बेहतर आज के लिए अथक परिश्रम की जरूरत है। जरूरी नहीं कि हमारे सपने राजनीति के तराजू पे तौले जाएं और लेफ्ट और राइट विंग के चक्कर मे यूं हीं दम तोड़ दे। हम अक्सर समाज मे बदलाव के लिए आवाज उठाने की खोखली कोशिश करते रहते हैं पर शायद खूद के खोंखलेपन के वजह से किसी दूसरों के अजेंडा का एक मोहरा बन कर रह जाते हैं।

हमारी सफलता-असफलता के लिए हमसे ज्यादा कोई और जिम्मेदार नहीं हो सकता। हमने सपने देखना छोड़ दिया है। जो बहुमूल्य प्रयास पहले हमारे खूबसूरत कल के लिए होना चाहिए वो न जाने क्यों बिखर सा गया है … हमारे सपने मर से गए है और ये सबसे खतरनाक है

मेहनत की लूट कविता अपनी श्याह पक्ष के साथ भी आज की प्रासंगिकता में उतनी ही सार्थक है.

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शुभारंभ 2019

रुकावटे भले मिले बड़ी,
तूफान हो विकट खड़ी ।।
हर मार्ग पर प्रशस्त हो,
लौह रथ पर सवार हो ।
अनेक अश्व हाथ में,
किसी से तुम कभी ना डरो।
तुम वीर बनो , जुझार हो;
शक्ति की ललकार बनो ।
सफलता तांडव करे;
परिश्रम इतना प्रचंड हो।
ऐसा हीं नववर्ष हो,
तुम तेज़ रहो, सशक्त हो, अखंड हो ।।

आपका व आपके सभी प्रियजनों का नववर्ष मंगलमय हो

शुभारम्भ 2019