कोरोना! तुम कल आना

आज वक़्त यकीन से आगे निकलना चाहता है।
एक कोरोना सम्पूर्ण सृजन को निगलना चाहता है।।
फिर से कोई खिंचे लक्ष्मण रेखा के अंदर आना चाहता है,

ये कैसी घड़ी है सुरसा मुहँ बाएं खड़ी है!
हर शख़्स बेहाल है मानवता बेसुध पड़ी है।
ये खूदगर्ज अश्क हमे बहाने पर अड़ी है।।

खिज़ा सुर्ख है इंसा परेशान ज़िंदगी हैरान है !
चीखता मूक नाद है गली-सड़क सब वीरान है
सब कुछ बंद है स्कूल, दफ्तर और न दुकान है ।।

कैसा मंज़र है सृजन के दरवाजे पर ताला हैं।
हर तरफ सिहरन है खौफ का शाया काला हैं।
सबको सबसे खतरें हैं! फ़िज़ा में कोरोना का जाला हैं।।

न जाने क्यूँ दिल ना-उम्मीद और मन हैरान सा है!
वसुधैव कुटुम्ब स्तब्ध! हर अक्स परेशां सा है!
ऋतम्बरा भी क्षुब्ध है, क्षितिज रुआँसा सा है।

हवा बाहर की कातिल है अब घर पर रहने की वेला है।
मुफलिसी का आलम है हर शख़्स डरा-सहमा अकेला है।।

हाँ मंज़र खौफनाक है पर ये सच्चाई नहीं जाने वाली,
यकीं कर खुदा है तो उसकी खुदायी नहीं जाने वाली।।

मेरी हमनफस, मेरे दोस्त, मेरे अज़ीज़, मेरे मोहसिन
तू क्यूँ परेशान है! तू परेशां ना हो ।
माना लंबी है एक्किस रातें, मगर रात हीं तो है!
हर दिन गुज़र जायेगा तेरा साथ तो है।

इस वीरान हुए वक्त मे तुम गुलमुहर बन जा।
घर पर रह और घर को गुलजार किए जा।
प्यार है तो प्यार कर, इश्क है तो इज़हार किए जा।।

गर नजदीकियों की ख्वाहिश है तो अभी दूरियाँ हीं सही।
सोशल डिस्टेनसिंग अंतिम सत्य है तो ये सत्य हीं सही।
स्वच्छता हीं लड़ने का अस्त्र है तो ये अस्त्र हीं सही।।

फिर से कोई हमारे सब्र का पुरजोर इम्तिहान लेना चाहता है
फिर से कोई एक अदद कातिल बन, हमसे उलझना चाहता है।
फिर कोई हमारी एकता की जोड़ को कसौटी पर कसना चाहता है।

  • *** शब्दार्थ
  • सुरसा – सुरसा रामायण के अनुसार समुद्र में रहने वाली नागमाता थी। सीताजी की खोज में समुद्र पार करने के समय सुरसा ने राक्षसी का रूप धारण कर हनुमान का रास्ता रोका था और उन्हें खा जाने के लिए उद्धत हुई थी।
  • खिज़ा पतझड़ की ऋतु । अवनति का समय ।
  • सुर्ख – लाल (जैसे—सुर्ख़ गाल)।
  • मूक नाद – लाचार शब्द, ध्वनि
  • वसुधैव कुटुम्ब – सारी पृथ्वी एक परिवार
  • स्तब्ध – सुन्न, निश्चेष्ट
  • ऋतम्बरा – सदा एक समान रहने वाली सात्विक और निर्मल बुद्धि।
  • क्षितिज – Horizon पृथ्वीतल के चारों ओर की वह कल्पित रेखा या स्थान जहाँ पर पृथ्वी और आकाश एक दूसरे से मिलते हुए से जान पड़ते हैं
  • मुफलिसी – निर्धन। धनहीन; गरीब.

जलेबियाँ उलझी रहें, तो बेहतर है!

सादगी जँचती नहीं, हर किसी पे यहाँ
जलेबियाँ उलझी रहें, तो बेहतर है!

Have A Wonderful Day Ahead…

Rgds,
Shashi Kumar
https://inspiringshashi.com

मेरी पसंद लाजवाब है

यक़ीन मानिए मेरी पसंद लाजवाब है, आप अपनी ही मिसाल ले लीजिए!

मेरी पसंद लाजवाब है

सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना – पाश

क्या आप #पाश को जानते हैं ! हाँ “अवतार सिंह संधू” इनका पूरा नाम यही है। इनकी हर लिखी पक्ति आज भी शूलगता हुआ शोला है। आज दुनियाँ जैसे भी उन्हे याद रखे पर उनकी रचित हर कविता मे सच्चाई की एक भीषण गंध है जोआपके अंतर्मन को झकझोर कर रख देती है।

आज पाश को जिस भी पक्ष से आप देख लें पर उनकी सारगर्भिता आप झूठला नहीं सकते। उनकी बेहद तल्ख और धारदार पंक्तियाँ पिघले लोहे की भांति आपके हर शय को चीरती हुयी आपके अंतर्मन में लहूलुहान हो चुके हर अनुभति को शब्दों दे देती है। शायद यही कारण है की आज भी उनकी कविता उतनी हीं रेलवन्ट मालूम पड़ती है जितनी कभी वो अपने दौर मे थी।

पाश हमे अक्सर आगाह करते रहे हैं साथ मे प्रेरित भी करते हैं कि आप जिस भी स्थिति मे हों उसे बेहतर करने की जद्दोजहद करते राहनी चाहिए। उनकी रचित एक बेहद लोकप्रिय कविता “मेहनत की लूट” चाहे जिस भी परिस्थिति मे लिखी गई हो पर आज भी उतना ही प्रासांगिक है । हर शब्द वेदना और विद्रोह की भीषण गंध लिए आपको प्रेरित करती है और बेहतर सपने देखने की हिम्मत देती है।

याद रहे, बेहतर कल का निर्माण आज के बेहतर सपनों से होती है और बेहतर आज के लिए अथक परिश्रम की जरूरत है। जरूरी नहीं कि हमारे सपने राजनीति के तराजू पे तौले जाएं और लेफ्ट और राइट विंग के चक्कर मे यूं हीं दम तोड़ दे। हम अक्सर समाज मे बदलाव के लिए आवाज उठाने की खोखली कोशिश करते रहते हैं पर शायद खूद के खोंखलेपन के वजह से किसी दूसरों के अजेंडा का एक मोहरा बन कर रह जाते हैं।

हमारी सफलता-असफलता के लिए हमसे ज्यादा कोई और जिम्मेदार नहीं हो सकता। हमने सपने देखना छोड़ दिया है। जो बहुमूल्य प्रयास पहले हमारे खूबसूरत कल के लिए होना चाहिए वो न जाने क्यों बिखर सा गया है … हमारे सपने मर से गए है और ये सबसे खतरनाक है

मेहनत की लूट कविता अपनी श्याह पक्ष के साथ भी आज की प्रासंगिकता में उतनी ही सार्थक है.

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