Know All About #PayAsYouDrive Insurance By Shashi Kumar Aansoo

The usage-based motor insurance, popularly known as ‘Pay As You Drive’, allows customers to pay the premium depending on how many kilometers the car has traveled. In the first tranche of sanctions, the Insurance Regulatory and Development Authority of India (Irdai) approved companies such as Bharti Axa General, Go Digit, TATA AIG, ICICI Lombard, etc.

Under this insurance scheme, a customer pre-declares vehicle usage for a period of one year. Accordingly, the insurance premium will be calculated dynamically as per the pre-declared distance in km. The customer can choose from three slabs – 2500 km., 5000 km. and 7500 km – as per his/her usage need.

Where to buy?

Insurers are now offering the usage-based product through their company websites, online insurance aggregators like PolicyBazaar.com, agents and other distribution channels.

If you want to buy the policy online, then you just have to provide the odometer reading, Know Your Customer (KYC) details, and fill up a customer consumer consent form.

Should you buy?

‘Pay As You Drive’ is ideal for the customers who have multiple vehicles and may not use each vehicle as much; therefore, they may not have to pay a large premium amount.

Also, If you are someone who mostly relies on public transport or even use your vehicles rarely due to medical complications, then this will help you cut cost on your vehicle insurance.

Also, another thing to consider is that a “Pay As You Drive” product is comprehensive own damage (OD) plus third party (TP) policy and is being offered on a pilot basis for a year. Insurers are required to sell 10,000 policies in six months to be able to offer this as a regular insurance policy.

आपके पास एक से ज्यादा गाड़ियां हैं या अपनी कार के इस्तेमाल की बजाए सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना बेहतर समझते हैं, ऐसे में आपको अपनी कार की इन्श्योरेन्स प्रीमियम पर ज्यादा नहीं खर्च करना पड़ेगा। आप #PayAsYouDrive जैसे पॉलिसी ले सकते हैं @shashiaansoo

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Disclaimer – Opinions expressed are solely my own or drawn from innumerable centers of lore. It do not express the views or opinions of my employer.

हेल्थ इंश्योरेंस अब जरूरी क्यों है? – All about health insurance

हम जानते हैं की इंडिया मे हेल्थ इनश्योरेंस कोई जबरदस्त एक्साटिंग शानदार खरीदने की चीज नहीं है। कोई भी इसे अपने टॉप विशलिस्ट मे नहीं रखता। जब भी हेल्थ इनश्योरेंस खरीदने की बात होती है सब नायाब इनोवेटिव बहाने ढूंढ लेते हैं… मसलन “बाद में कर लेंगे अभी तो जवान हैं”, “देख लेंगे अभी दूसरा काम है” , “अभी थोड़ा हाथ टाइट है नेक्स्ट टाइम करेंगे ”. यहाँ सब अपने ही एक्सक्यूज से लड़ते रहते हैं.

मैं आपसे बस एक बात कहूँगा “हाँ ये सच है कि हेल्थ इन्सुरंस या कोई भी इन्श्योरेन्स जब आप खरीदते है तो वो कोई खाश खुशी नहीं देती क्योंकि ये कोई भोग विलाश की वस्तु नहीं होती है पर याद रहे संकटकाल में इनश्योरेंस की अनुपस्थिति आपकी सारी खुशियों को बर्बाद कर सकती है।

तो चलिए आज मैं कुछ और इम्पॉर्टन्ट कारण बताता हूँ जिससे शायद आपको हेल्थ इन्श्योरेन्स की प्रासंगिकता समझने में मदद मिल पायें….

1. सबसे पहले कि हम कोई फैंटम नहीं हैं…

यहाँ कोई फैंटम नहीं हैं – Shashi Kumar Aansoo

हम सब जानते हैं कि आज कोई सुरक्षित नहीं है। कोई भी बीमार हो सकता है, किसी को कहीं भी संक्रमण अपनी चपेट मे ले सकता है। एक्सीडेंट की तो पूछिए मत!

सो ये बात तो क्लेयर है की हम कोई फैंटम ना हीं सुपर मैन हैं ना सुपर वुमन ये गलतफहमी से दूर रहें कि “हमे कुछ नहीं होगा” आज की परिस्थिति हमारा सुपर सेंस तो यही कहता कि जल्द हेल्थ इन्श्योरेन्स कवर ले लें ताकि कम प्रीमियम पड़े।

अगर आप 40 साल की उम्र से पहले ये हेल्थ इनश्योरेंस कवर लेते हैं तो आपको बिना शर्त के मैक्सिमम फायदा मिल सकता है।

2. कोरोना जैसे वायरस का अकस्मिक आघात

अगर कोरोना जैसे खतरनाक परिवार का विषाणु अगर बेलगाम हो जाये तो हम परिणाम देख रहें हैं…

फिलहाल आप कोविड-19 की से तो परिचित हो चुके हैं। ऐसे बहुत सारे दुर्दांत वायरस जो हमारी देह की दहलीज लांघ कर हमे रोग ग्रसित करना चाहता है, बस एक असावधानी ही काफी है। 

वैसे दुनिया पहले से H2N2, एशियन फ्लू, रैबीज, इबोला, HIV, Smallpox,रोटा वायरस, सार्स, मर्स और न जाने कितने वायरस की भयावहता झेल रही है ।

ऐसे काल मे एक सम्पूर्ण हेल्थ इनश्योरेंस की सख्त जरुरत है जिससे हम बेफिक्र होकर बेस्ट मेडिकल सुविधा ले सकें बिना खर्चों की चिंता कीये।  

3. फ्री हेल्थ चेक-उप की सुविधा

हेल्थ चेक उप हमे अगाह करते रहता है

हर कोई युवराज सिंह जैसा लकी नहीं होता।  उनकी कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का पता शुरुआती दिनों में सिर्फ इसलिए लग पाया था क्योंकि उसकी नियमित हेल्थ चेक उप होती थी। वह एक खिलाड़ी था।  

हमारे यहाँ तो जब तक कि कोई बड़ी विपदा न आ जाए हम हम अपना हेल्थ चेक-उप टालते रहते हैं। फैन्टम जो ठहरे! हम यहाँ भी जुगाड़ कर लेते हैं ये जानते हुए कि रेगुलर हेल्थ चेक-उप हमें दुर्दांत रोगों की आहट पहले दे देती है पर हम इगनोर करते रहते है। 

हेल्थ इनश्योरेंस आपको फ्री हेल्थ चेक-उप की सुविधा देती है ताकि आप प्रीपेयर्ड रहें।

4 अव्यवस्थित 24/7 की जीवन-शैली

आज हम अपने आप को 24/7 वाले जनरेशन कहलाने में गौरवान्वित महसुस करते है पर ताज़ा सर्वेक्षण साफ-साफ इंगित करता है कि ये भागमभाग की जिंदगी हमें धीमे-धीमे बीमार और बीमार कर रही है। फिजिकल एक्टिविटी हमारी प्राइऑरटी में नीचे जा रही है।  

खान-पान की तो अलग दुविधा है। मिडल क्लास मे तो चाइनीज, कॉन्टिनेंटल और इटैलियन फूड खाना स्टैटस सिंबल बनता जा रहा है।

इंस्टाग्राम पर पोस्ट जो करना हैं #हैविंग_इटैलियन_फूड पेट अपना दुखड़ा भी नहीं कह पा रहा दिन ब दिन हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ती जा रही हैं। नए नए रोग पनप रहे हैं।  आए दिन हमे अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

ये सब आकस्मिक खर्चे का जंजाल है, इसके लिए जरूरी है कि हमारे पास स्वास्थ्य बीमा हो जो बुरे वक्त मे काम आ सके।   

5. आस-पास का बढ़ता प्रदूषण

WHO के हाल के रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण हमारे फेफड़े, हृदय और हमारे सारे नाज़ुक अंगों पर अपना खतरनाक कुप्रभाव डाल रही है। जाने अनजाने कितने तरह के प्रदूषण के संपर्क मे हम आते रहते हैं।

भारत मे हर साल 18 लाख लोगों की मौत का जिम्मेदार ये वायु प्रदूषण है। विशेषज्ञ तो यहाँ तक मानते हैं की दिल्ली मे अकेले 30 हजार प्रीमेच्योर मौतों के लिए ये प्रदूषण हीं जिम्मेदार हैं। आकड़े पुराने है पर डरावने हैं।

हम दिन व दिन नये रोगों के प्रति इक्स्पोज़ होते जा रहें हैं ऐसे में प्रीपेयर्ड रहना हमारी मज़बूरी और जरूरत दोनो बन गई है।

6. हृदय व कैंसर रोगियों की बढ़ती तदात

आंकड़ों की मानें तो पिछले 25 बरस में हृदय रोगियों की तादाद में 50 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. एक स्टडी के अनुसार 75 वर्ष की उम्र से पहले कैंसर से मौत का जोखिम (मोर्टेलिटी रेट) पुरुषों में 7.34 फ़ीसदी और महिलाओं में 6.28 फ़ीसदी तक होता है। आज भारत में होने वाली 61% मौतों के लिए असंक्रामक बीमारियाँ (NCD – Non-Communicable Disease), जैसे कैंसर, डायबिटीज और हृदय रोग जिम्मेवार है।

लोगों की निष्क्रिय जीवनशैली और खानपान की खराब आदतों के चलते हृदय रोग से पीड़ित लोगों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। कुछ वर्ष पहले तक, 50 से 60 वर्ष के बीच की उम्र वाले लोगों के लिए हृदय रोग चिंता का विषय हुआ करता था, लेकिन अभी 20 से 40 वर्ष की आयु वर्ग वाले लोगों में भी यह दिखना शुरू होने लगा है।

भारत में निजी अस्पतालों में सामान्य हृदय रोग के उपचार पर 1,50,000 रुपए से 6,00,000 रुपए का खर्च आता है और दवाइयों पर आने वाला मासिक खर्च अलग है।

हृदय रोग के बढ़ते खतरों के मद्देनजर कार्डियक प्लान वाली बीमा पॉलिसी है जरूरी हो गई है।

7. फाइनेंशियल ब्रेक डाउन से सुरक्षा

याद रहे हॉस्पिटल किसी तरह का मोल भाव या नेगोशिएशन नहीं करती है। जिस तरह से हेल्थ सर्विस में सुधार आ रहा है सुविधाएं भी बहुत महंगी होती जा रही है। हम सबने अपने आसपास खेत-जेवर बिकते देखे हैं। ख़ुशहाल परिवार को  अचानक आये मेडिकल विपदाओं के कारण पैसे के लिए बिलखते देखे हैं।
हेल्थ इन्सुरंस उन्ही अप्रत्याशित खर्चों का ख्याल रखती है जो अचानक अस्पताल में भर्ती होने से उत्पन्न होता है। फाइनेंसियल एक्सपर्ट की एक हीं सलाह होती है की आप आपने सालाना आय का 2% हेल्थ इनश्योरेंस के लिए व्यय करें।  

इंश्योरेंस कंपनियों का हर बड़े-छोटे हॉस्पिटलों से टाई-अप होता है, अगर आपके पास हेल्थ इंश्योरेंस है तो आप अपना उपचार कहीं भी करा सकते है वो भी कैशलेस सुविधा के साथ। आपको इलाज के लिए पैसों की चिंता करने की जरूरत नहीं होती। आपके हॉस्पिटल बिल के लिए नेगोशिएशन करने की जरूरत नहीं होती ये काम आपकी इन्श्योरेन्स कंपनी करती है.  आप बेफिक्र होकर अपना इलाज करा सकते हैं।


हेल्थ इंश्योरेंस में मरीज को हॉस्पिटल लाने ले जाने में एंबुलेंस का जो  खर्च भी कवर होता है। 

हाँ इन सब के साथ हेल्थ इनश्योरेंस के लिए जो प्रीमियम का भुगतान किया जाता है, उस पर आयकर भुगतान अधिनियम की धारा 80डी के तहत टैक्स में छूट मिलती है।

त्रुटियों के लिए अग्रीम माफी –
इसमें बहुत सारी त्रुटियां हो सकती है पर मैंने अपनी कपैसिटी मे ईमानदार कोशिश की है और आशा करता हूं कि आप अपने कमेंट से मुझे और सुझाव देंगे। आप से आग्रह है की इसे समझे और इस बात से अपने आसपास के लोगों को अवेयर करें। मेरी यह कोशिश है कि समाज में इनश्योरेंस के बारे में अवरेनेस बढ़े इसलिए मैं बोलचाल की भाषा उपयोग करता हूँ . मैं कोई लल्लनटॉप नहीं हूँ और न इनश्योरेंस का ज्ञाता। बस जितना जानता हूँ वो आप तक बढ़ा दिया। अच्छा लगे तो आप दुसरो को बढ़ा दे बस यही मेरी चाहत है. मैं चाहता हूँ की इस लॉक डाउन में हम और स्टीरिओ टाइप के ज्ञान से थोड़े आगे बढ़े कुछ नया सीखे कुछ नया जाने

धन्यवाद।

#Disclaimer – Opinions expressed are solely my own or drawn from innumerable centers of culture & lore. It do not express the views or opinions of my employer.

IRDAI To Keep Third Party Motor Insurance Premiums Unchanged For All Vehicles In FY’21

Highlights

  • IRDAI will not increase the premium rates of third party motor insurance.
  • The increase in premium rates would have had multiplier effect.
  • SIAM had requested IRDAI to not revise the premium rates.

At a time when the entire nation is fighting against the novel COVID-19 by remaining indoors and putting a stop at all non-essential outdoor operations, the economy and industries are bearing the brunt of it. The Society Of Indian Automobile Manufacturers (SIAM) had already said that the auto industry is incurring a loss of Rs. 2300 crore per day of closure and trying that the situation doesn’t worsen further, SIAM had requested the Insurance Regulatory And Development Authority of India (IRDAI) to not revise the third party motor insurance charges for FY2021. The IRDAI has accepted the submission and will be retaining its premium rate for the financial year.

Rajan Wadhera, President, SIAM stated, “We are thankful to the Insurance Regulatory and Development Authority of India (IRDAI) for keeping the Third Party Motor Insurance Premium Rates unchanged for all vehicle categories for the Financial Year 2020-21. This is in line with SIAM’s submission to IRDAI on retaining premium rates and, thereby, avoiding an increase in the cost of vehicle acquisition for end consumers.”

मोटर इंश्योरेंस के पक्ष : What Are Parties In General Insurance – Shashi Kumar Aansoo

मोटर इंश्योरेंस के संबंध में तीन पक्ष (Parties) होते हैं —

A. First Party (प्रथम पक्ष):
वह पक्ष (व्यक्ति या संस्था) जो कि जो बीमा खरीदता है वह First Party (प्रथम पक्ष) होता है। बीमा के संबंध में बीमा ग्राहक को प्रथम पक्ष माना गया है।

B. Second Party (द्वितीय पक्ष):
वह पक्ष, जो कि बीमा पॉलिसी बेचता है वह Second Party (द्वितीय पक्ष) होती है। बीमा के संबंध में बीमा कंपनी को द्वितीय पक्ष माना गया है।

C. Third Party (तृतीय पक्ष):
बीमा ग्राहक और बीमा कंपनी के अलावा कोई अन्य व्यक्ति या संपत्ति जो कभी भी किसी वाहन दुर्घटना के चपेट में आ सकता है उसे इन्श्योरेन्स के संबंध में थर्ड पार्टी कहा जाता है अर्थात Third Party (तृतीय पक्ष) वह है जिसे कभी आपके वाहन की टक्कर से नुकसान पहुंच

थर्ड पार्टी इंश्योरेंस ऐसी बीमा पॉलिसी होती है, जिसका फायदा न तो बीमा करवाने वाले कस्टमर (प्रथम पक्ष = First Party) को होता है और न ही बीमा करने वाली कंपनी (द्वितीय पक्ष = Second Party) को होता है बल्कि इस बीमा का फायदा, अलग किसी अन्य क्षतिग्रस्त होने वाले व्यक्ति Third Party या सम्पत्ति को होता है। इसमे उस अन्य व्यक्ति या संपत्ति को हर्जाना मिलेगा, जिसे आपके वाहन से नुकसान पहुंचा है। इसमें आपको या आपके वाहन को हुए नुकसान का कोई क्लेम नहीं मिलेगा।

हेल्थ और लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी से ऐसे बचाएं टैक्स

मौजूदा वित्त वर्ष के लिए अगर आपने अब तक टैक्स सेवर नहीं खरीदे हैं तो इन इंश्योरेंस प्रॉडक्ट्स पर विचार करें। अगले वित्त वर्ष से अगर आप नई टैक्‍स व्‍यवस्‍था चुनते हैं तो टैक्स बचाने को लेकर इंश्‍योरेंस की प्रासंगिकता खत्म हो सकती है।

आप भी उन लोगों में हैं जो अपनी टैक्‍स देनदारी घटाने के लिए इंश्‍योरेंस पॉलिसी खरीदते हैं? मौजूदा वित्त वर्ष के लिए अगर आपने अब तक टैक्स सेवर नहीं खरीदे हैं तो इन इंश्योरेंस प्रॉडक्ट्स पर विचार करें। अगले वित्त वर्ष से अगर आप नई टैक्‍स व्‍यवस्‍था चुनते हैं तो टैक्स बचाने को लेकर इंश्‍योरेंस की प्रासंगिकता खत्म हो सकती है, क्योंकि नी व्यवस्था में आपको डिडक्‍शन और एग्‍जेम्‍पशन नहीं मिलेंगे।

बहरहाल जानकार कहते हैं कि इंश्‍योरेंस केवल टैक्‍स बचाने के मकसद से नहीं खरीदना चाहिए। मौजूदा टैक्‍स सिस्टम में लाइफ इंश्योरेंस और मेडिक्‍लेम खरीदने पर कई तरह की टैक्‍स छूट मिलती है। इनकम टैक्स कानून, 1961 में कई प्रावधान हैं जिनके तहत आप टैक्‍स डिडक्शन क्‍लेम कर सकते हैं। आइए जानें इनके बारे में।

सेक्‍शन 80C
मौजूदा टैक्स सिस्टम में आप एन्डाउमेंट, होल लाइफ, मनी बैक, टर्म इंश्‍योरेंस और यूलिप (यूनिट लिंक्‍ड इंश्‍योरेंस पॉलिसी) जैसी इंश्‍योरेंस पॉलिसी के प्रीमियम के भुगतान पर सेक्‍शन 80सी के तहत आप डिडक्‍शन क्‍लेम कर सकते हैं। हालांकि, इस सेक्‍शन के तहत अधिकतम 1.5 लाख रुपये तक के निवेश पर ही टैक्‍स छूट मिलती है।

सेक्‍शन 80CCC
सेक्‍शन 80सीसीसी के तहत लाइफ इंश्योरेंस कंपनी के ऐन्‍युइटी प्‍लान के लिए पे की जाने वाली रकम पर छूट मिलती है। इस सेक्शन के तहत टैक्‍स डिडक्‍शन की सीमा 1.5 लाख रुपये है। यह सेक्‍शन 80सी और 80सीसीडी के तहत छूट में शामिल है। यानी इन तीनों सेक्‍शन को मिलाकर इनके तहत 1.5 लाख रुपये की टैक्स छूट का दावा किया जा सकता है।

पेंशन प्‍लान्स के अमूमन दो हिस्‍से होते हैं। ऐक्‍युमुलेशन फेज और विदड्रॉल या पेआउट फेज। पॉलिसी मैच्‍योरिटी डेट तक आप जो प्रीमियम देते हैं, उसमें से कुल रकम का 60% आप एकमुश्‍त ले सकते हैं। बाकी की रकम नियमित पेंशन के तौर पर आपको मिलती है।

आप सेक्‍शन 80CCC के तहत डिडक्‍शन क्‍लेम कर सकते हैं। डिडक्‍शन की सीमा 1.5 लाख रुपये तक है। वहीं विदड्रॉल फेज में एकमुश्‍त राशि का एक तिहाई टैक्‍स-फ्री होता है। बची हुई रकम को या तो एकमुश्‍त या रेगुलर पेंशन के तौर पर दिया जाता है। इसे उस साल की इनकम माना जाता है. इस पर करदाता को टैक्‍स देना पड़ता है.

सेक्‍शन 10 (10D )
इनकम टैक्स के इस सेक्‍शन के तहत लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी की मैच्‍योरिटी या इसे सरेंडर करने या इंश्योर्ड व्‍यक्ति की मौत हो जाने पर मिलने वाली रकम (सम अश्‍योर्ड) और बोनस पूरी तरह टैक्‍स फ्री हैं। यह एग्‍जेम्‍पशन सेक्‍शन 10 (10D) के तहत मिलता है।

हेल्‍थ इंश्‍योरेंस पर टैक्‍स में फायदे
हेल्‍थ इंश्‍योरेंस पॉलिसी के मामले में आप सेक्‍शन 80D के तहत टैक्‍स छूट ले सकते हैं।

सेक्शन 80D
1- इस सेक्‍शन में लाइफ पार्टनर, बच्चों और अपने लिए प्रिवेंटिव हेल्थकेयर चेकअप की कॉस्ट के साथ हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम के लिए आप 25,000 रुपये तक डिडक्शन क्लेम कर सकते हैं।
2-अगर माता-पिता के लिए हेल्थ इंश्योरेंस खरीदते हैं तो 50,000 रुपये तक एक्स्ट्रा डिडक्शन पा सकते हैं बशर्ते माता-पिता सीनियर सिटिजन हों।

अगर टैक्सपेयर और उसके माता-पिता दोनों की उम्र 60 साल से ज्‍यादा है तो मेडिक्‍लेम पॉलिसी पर 1 लाख रुपये तक डिडक्‍शन क्लेम किया जा सकता है।

Sachin Bansal buys DHFL General Insurance

Flipkart co-founder Sachin Bansal’s bet on the insurance firm is part of his broader ambition in financial services industry.

The deal has been routed through Navi Technologies, formerly BAC Acquisitions which Bansal had founded along with IIT-Delhi batchmate Ankit Agarwal after selling stake in Flipkart in 2018.
Sources said Bansal has bought out the entire stake in the insurer, held by Kapil
Wadhawan-owned WGC. “Navi is actively scouting for opportunities in BFSI space,” a spokesperson for the company said when contacted . “Specifically, it is interested in the intersection of technology and financial services, where we believe technology can be harnessed to improve access and availability of financial services,” the spokesperson said.

DHFL General Insurance has about Rs 400 crore assets under management.
“Bansal wants to get a footing into the banking and financial services sector. There has been a lot of talk about him being keen on obtaining a banking licence and has been looking at opportunities in the asset management space,” a source said. Bansal’s move to step into the insurance sector comes on the back of Navi Technologies acquiring a majority stake in Chaitanya Rural Intermediation Development Services, which runs a microfinance platform. Having picked up more than 90% stake in Chaitanya, he took over as its chief executive last year.

How To Renew Your Car Insurance – Know the Basic Facts of General Insurance : (आपकी गाड़ी का इंश्योरेंस रिनूअल)

आपकी गाड़ी का इन्सुरंस सही समय पर रिनूअल हो ये मोटर व्हीकल एक्ट के तहत आपकी कानूनी व अहम् जिम्मेदारी है ख्याल रहे मोटर इंश्योरेंस एक्ट के अनुसार भारत में थर्ड पार्टी मोटर इंश्योरेंस अनिवार्य है।
कभी-कभी हम जानकारी के अभाव में या गलत जानकारी के वज़ह से अपनी गाड़ियों की बीमा में टालमटोली कर बैठते है और बड़े जोखिम को वेवज़ह न्योता दे बैठते हैं । लोग इन्श्योरेन्स न होने की भयावहता से शायद परिचित नहीं होते है याद रहे इन्श्योरेन्स हमे कोई खुशी प्रदान तो नहीं करती पर पर पर इसकी अनुपस्थिति हमारी खुशियों पर ग्रहण जरूर लगा जाती है। हम कुछ पैसे बचाने के चक्कर मे अपनी खूद की गाड़ियों का इंश्योरेंस नहीं करके अपना हीं नुकसान कर बैठते हैं।

आज सभी प्रमुख इंश्योरेंस कंपनी हर जगह प्रमुखता से से उपलब्ध है। आप आपकी कार के इन्श्योरेन्स का तुलनात्मक अध्ययन व उसके सभी उपलब्ध सुविधाओं के बारे मे रिनूअल के पहले सटीक जानकारी ले सकते हैं। आज ज्यादातर जनरल इन्श्योरेन्स कंपनी अपने रिनूअल के लिए सारे ऑनलाइन पेमेंट का विकल्प देती है और साथ मे आपका एजेंट भी आपंकों एस काम मे मदद करते है।

आजकल के डिजिटल वर्ल्ड मे जानकारी प्राप्त करना बेहद आसान है बस जरूरत है की आप सब्जेक्ट मैटर को बेहतर ढंग से समझे इसलिए यदि आपके कार इन्श्योरेन्स का रिनूअल नजदीक है, तो चलिए कुछ ध्यान रखने वाली कुछ बेहद इम्पोर्टेन्ट टर्म्स को जान लेते हैं ….

. सही इंश्योरेंस कंपनी का चुनाव (Select the Correct Insurance Company) : अगर आपकी वर्तमान इन्सुरंस कंपनी आपको सही सुविधा नहीं दे रही तो रिन्यूअल के वक्त आप नए इंश्योरेंस कंपनी में अपनी कार का इन्सुरंस रिन्यूअल करवा सकते हैं पर ख्याल रहे कम प्रीमियम के चक्कर में आप गलत सिलेक्शन न कर बैठे। आप सही कंपनी के चुनाव करते वक्त यह सुनिश्चित कर ले की उक्त कंपनी की सर्विस आपके शहर में या उसके आस पास के शहरों में उपलब्ध है या नहीं ! ऐसा न हो की जरुरत पड़ने परआपको मदद हीं न कर सकें. आप उसकी लोकल ब्रांच की उपलब्धता जरूर देख लें ।

२. इंश्योरेंस के प्रकार की सही जानकारी (Find The Correct Insurance Coverage Type): आप एक बार सही इन्श्योरेन्स कंपनी की तलाश अगर पूरी कर लेते हैं तो अप अपनी कार के लिए सही कवरेज के बारे में जानकारी का पता लगायें. आपके कौन-कौन सी कवरेज की आवश्यकता है और उनकी बेस्ट कीमत कितनी है, इसका पता लगाएं।  आप आपने एजेंट से अपनी रिन्यूअल नोटिस की मांग करें और दिए गए कवरेज को समझे या आपने एजेंट की सहायता लें। आप कंपनी के कस्टमर केयर को कॉल करके भी आपकी रिनूअल में दिए गए कवरेज की जानकारी ले सकते हैं। ऐसे प्रचलित रूप से हमारे इंडिया मे मोटर इंश्योरेंस मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं…

  • कंप्रिहेंसिव इंश्योरेंस पॉलिसी(Comprehensive Insurance ):

    यह एक प्रकार की नियमित मोटर पॉलिसी होती है। इसका दायरा भी बड़ा होता है। इसके तहत इंश्योरेंस कंपनी फर्स्ट पार्टी यानी आपका एवं थर्ड पार्टी अर्थात आपके अलावा अन्य किसी का दुर्घटना में हुए जान माल का नुकसान का खर्च की भरपाई करती है। बोलचाल की भाषा में इसे फुल पार्टी इन्सुरंस भी कहते  हैं।
  • थर्ड पार्टी इन्श्योरेन्स पॉलिसी (Third Party Insurance):

    थर्ड पार्टी इन्श्योरेन्स कानूनन अनिवार्य होता है। थर्ड पार्टी इंश्योरेंस को समझने के पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि “थर्ड पार्टी” क्या होता है…

दरअसल मोटर इंश्योरेंस के संबंध में तीन पक्ष (Parties) होते हैं —  

  1.  First Party (प्रथम पक्ष): वह पक्ष (व्यक्ति या संस्था) जो कि जो बीमा खरीदता है वह First Party (प्रथम पक्ष) होता है। बीमा के संबंध में बीमा ग्राहक को प्रथम पक्ष माना गया है।
  2. Second Party (द्वितीय पक्ष): वह पक्ष, जो कि बीमा पॉलिसी बेचता है वह Second Party (द्वितीय पक्ष) होती है। बीमा के संबंध में बीमा कंपनी को द्वितीय पक्ष माना गया है।
  3. Third Party (तृतीय पक्ष): बीमा ग्राहक और बीमा कंपनी के अलावा कोई अन्य व्यक्ति या संपत्ति जो कभी भी किसी वाहन दुर्घटना के चपेट में आ सकता है उसे इन्श्योरेन्स के संबंध में थर्ड पार्टी कहा जाता है अर्थात Third Party (तृतीय पक्ष) वह है जिसे कभी आपके वाहन की टक्कर से नुकसान पहुंच सकता है।  

    थर्ड पार्टी इंश्योरेंस ऐसी बीमा पॉलिसी होती है, जिसका फायदा न तो बीमा करवाने वाले इन्शुर्ड (प्रथम पक्ष=First Party) को होता है और न ही बीमा करने वाली कंपनी (द्वितीय पक्ष=Second Party) को होता है बल्कि इस बीमा का फायदा, अलग किसी अन्य क्षतिग्रस्त होने वाले व्यक्ति Third Party या सामान को होता है। सिर्फ उस अन्य व्यक्ति या संपत्ति को हर्जाना मिलेगा, जिसे आपके वाहन से नुकसान पहुंचा है। इसमें आपको या आपके वाहन को हुए नुकसान का कोई क्लेम नहीं मिलेगा।
  • Standalone OD/ SAOD Insurance (स्टैंड अलोन ओ डी रिन्यूअल ): सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार अगर आप नये दोपहिया वाहन खरीदते है तो पाँच साल का और प्राइवेट कार खरदते हैं तो तीन साल का थर्ड पार्टी इन्श्योरेन्स अनिवार्य रूप से करना पड़ेगा । इसी लिए IRDAI ने 1 सितंबर 2018 से नई व पुरानी कारों और दोपहिया वाहनों के लिए नई इन्श्योरेन्स पॉलिसी स्टैंडअलोन ओडी कवर की की व्यवस्था की है। अगर आप दोपहिया गाड़ी खरीदते है तो अक्सर आपकी इन्श्योरेन्स 1+5 टर्म (1 Year OD + 5 Years TP Cover) की मिलती है जहाँ एक साल कंप्रिहेंसिव कवर और बाकी अगला चार साल थर्ड पार्टी कवर हीं होता है, वही अगर आप कार खरीदते हैं तो वह १+३ टर्म (1 Year OD + 3 Years TP Cover) की होती है इसका सीधा मतलब एक साल कंप्रिहेंसिव कवर और बाकी अगला दो साल सिर्फ थर्ड पार्टी कवर हीं होता है । जब आपकी गाड़ी का एक साल पुरानी होती है तो आपके गाड़ी के OD कवर का रिनूअल इसी स्टैंड अलोन ओडी रिन्यूअल के तहत होता है ताकि आपकी गाड़ी का कंप्रिहेंसिव रिस्क चालू रहे .
    आजकल सभी इन्श्योरेन्स कंपनी प्रमुखता से स्टैंडअलोन ओडी इंश्योरेंस कवरेज प्रदान करती है।

3 .सही ऐड ऑन प्लान का चुनाव (Select The Correct Add-On Plan): आपकी कार का बेसिक कंप्रिहेंसिव इन्श्योरेन्स कवरेज मे बहुत सारे कन्डिशन होते हैं जिसके कारण दुर्घटना के बाद पूरा हर्जाना या क्लेम नहीं मिल पता पता है अतः सही ऐड-ऑन कवर का चुनाव अतिअवाश्यक है. जैसा कि नाम बताता है, यह आपके  नियमित मोटर पॉलिसी के दायित्व के अतिरिक्त, कुछ ऐड ऑन रिस्क कवर करती है जिसे कुछ अतिरिक्त राशि का भुगतान करके प्राप्त किया जा सकता है। आज हरएक इंश्योरेंस कंपनी आपके मूल मोटर बीमा पॉलिसी के साथ कई वैकल्पिक एड-आँन कवर दे रही है। यदि सही कवर चुना जाता है तो ये मनीसेवर्स हैं। ऐड-ऑन एक बेसिक कार इंश्योरेंस पॉलिसी का दायरा भी बढ़ाते हैं।

कुछ प्रचलित ऐड-ऑन कवर इस प्रकार हैं….(Following are Some Popular Add-on Coverage Options…

  • ज़ीरो डेप्रीसियेशन कवर (Zero/Nil Depreciation Reimbursement Cover):  आपकी गाड़ी में एक्सीडेंट के वज़ह से या अन्य किसी कारन से  किसी भी तरह का नुकसान पहुचता है तो इन्श्योरेन्स कंपनी क्लेम के बाद बदले गए पार्ट्स की कीमत का पूरा भुगतान नहीं करती बल्कि एक निश्चित प्रतिशत की राशि काट कर क्लेम का भुगतान करती है।  उसी काटे गए रकम को क्लेम डेप्रीसियेशन (मूल्यह्रास) कहते हैं जैसे सभी प्रकार के रबर/नायलॉन/प्लास्टिक पार्ट्स, टायर और ट्यूब, बैटरी और एयर बैग के लिए-50% और फाइबर ग्लास के लिए – 30% डेप्रीसियेशन होता है.  मेटल और लकड़ी के पार्ट के लिए उसके उम्र के अनुसार क्लेम अमाउन्ट मे से डेप्रीसियेशन किया जाता है जो की पहले 5% से 50% तक जाता है. यदि आप ज़ीरो डेप्रीसियेशन कवर / निल डेप्रीसियेशन का विकल्प चुनते हैं, तो नुकसान के मामले में इन्श्योरेन्स कंपनी आपके क्लेम के वक्त किसी भी तरह की कटौती/डेप्रीसियेशन नहीं करती है।
  • इंजन सिक्योर (Engine Secure Cover): इंजन में पानी के प्रवेश के कारन या इंजन से लुब्रिकेंट के रिसाव के कारन आपकी गाड़ी के इंजन, गियर बॉक्स या ट्रांसमिशन असेंबली में किसी भी प्रकार की क्षति पहुचती है तो इंजन सिक्योर कवर हीं इंजन और गियर बॉक्स के आंतरिक भागों के नुकसान की मरम्मत या रिप्लेसमेंट के खर्चों को कवर करती है।
  • रिटर्न टू इन्वाइस (Return to Invoice Cover): अगर आपकी गाड़ी चोरी हो जाती है या एक्सीडेंट के बाद टोटल लॉस केटेगरी मे आती है तो इन्श्योरेन्स कंपनी सिर्फ आपको आपकी गाड़ी के  IDV (सम इन्शुर्ड वैल्यू) या करंट रिप्लेसमेंट वैल्यू का क्लेम पेमेंट करती है पर अगर आप रिटर्न टू इन्वाइस ऐड ऑन कवर का विकल्प चुनते है तो ऐसी परिस्थिति आपको आपकी गाड़ी के IDV (सम इन्शुर्ड वैल्यू) के जगह गाड़ी की इन्वाइस वैल्यू (खरीदने व्यक्त की कीमत) का भुगतान करती है. इसके साथ-साथ  फर्स्ट टाइम रजिस्ट्रेशन चार्ज और रोड टैक्स का भी का भुगतान करती है. आप चंद और पैसे लगाकर नयी गाड़ी ख़रीद सकते है।
  • कंज़्यूमेबल्स कवर (Consumables Expenses Cover) : आपकी गाड़ी मे क्लेम के बाद नुकसान की मरम्मत या रिप्लेसमेंट के दौराननट बोल्ट, कूलेंट, इंजन ऑइल, ब्रेक ऑइल, बेयरिंग, ग्रीस, कन्डिशनर गैस आदि जैसी कंज्यूमेबल्स आइटम की कीमत कार इंश्योरेंस में कवर नहीं होती है हाँ अगर आप ‘कंज्यूमेबल्स कवर ऐड-ऑन’ का विकल्प लेते हैं, तो आपको कंज्यूमेबल्स आइटम मे किए गए खर्च का मुआवजा मिल सकता है।
  • की रिप्लेसमेंट कवर (Key Replacement Cover) : अगर आपकी गाड़ी की चाभीखो जाती है या चोरी हो जाती है या चाभी आपकी गाड़ी में ही टूट जाती है तो यह की (चाबी) रिप्लेसमेंट कवर हीं उसे मरम्मत या बदले जाने की खर्च को कवर करती है. अमूमन यह बेसिक इन्श्योरेन्स पॉलिसी मे कवर नहीं होता है। इस कवर को प्राप्त करने के लिए पुलिस शिकायत अनिवार्य है।
  • टायर सिक्योर कवर (Tyre Secure Cover) : आपकी नॉर्मल इन्श्योरेन्स पॉलिसी सिर्फ टायर या ट्यूब मे हुए नुकसान को कवर नहीं करती है।  जब एक्सीडेंट के वजह से आपकी गाड़ी को तो कोई नुकसान नहीं होता पर टायरों और ट्यूबों को नुकसान पहुँचता है जैसे बबल, पंचर, बर्स्ट या कट जाना या क्षति होना तब टायर सिक्योर कवर उसे रिप्लेसमेंट करने या उसे मरम्मत किए जाने वाले खर्चों को कुछ शर्तों के साथ कवर करती है।

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ISRO likely to purchase first insurance policy for satellite

According to the information from sources, the Indian Space Research Organisation (ISRO) is eying to buy its first insurance policy for a domestically launched space satellite, the first since it began launching satellites in 1975.
There can be two factors which are expected to have been influencing ISRO to begin buying satellite insurance.

Firstly, there is an unexpected setback in Project Chandrayaan-2, which cost nearly INR10 billion (US$139.4 million). Secondly, there is the success of ISRO’s Mars mission, which brought down reinsurance rates for Indian space exploration activities.

While ISRO has not insured launches conducted on Indian soil, it has typically insured launches done in partnership with other countries, such as Russia and the US. New India Assurance and other state-owned insurers were typically those tapped to provide cover for these projects, with reinsurance from the international market.

IRDAI sets up working group to review title insurance structure

A working group has been constituted by IRDAI ( Insurance Regulatory and Development Authority of India) to revisit the product structure of title insurance, develop a standard product and recommend measures to spur demand for the product. The decision comes in the backdrop of a less-than-desired response to title insurance products. “The number of title insurance policies sold is minimal despite availability for the last one and half years and the obligation cast under the Real Estate (Regulation and Development) Act, 2016 upon promoter/developers to obtain the said policy,” said the IRDAI order, while constituting a 12-member working group.

There are very few general insurers that offer title insurances and their product features vary in policy terms and conditions and scope of coverage depending on the support received from their reinsurers. While stating this, IRDAI said the feedback received from the Government of India revealed that stakeholders, especially developers associations, had flagged the need for standardisation in title insurance products.

The working group has been formed with a deadline of three months to submit the report. Apart from developing a standard product and coming out with recommendations to spur demand, the group will examine the legal and regulatory framework in place and its impact on the marketability of title insurance; study the structure of such products available and analyse reasons for sluggish demand; and suggest augmentation of reinsurance capacity in the domestic market.

Premium Rates for Motor Insurance Cover for FY 2019-20

Premium Rates for Motor Insurance Cover for FY 2019-20 (WEF. 16/06/2019)

Disclaimer: Its Ready Reckoner Indian Motor tariff Rates as per IRDIANL/NL/NTFN/MOTP/91/06/2018

For Details Refer IRDA Website –
https://www.irdai.gov.in/ADMINCMS/cms/frmGeneral_Layout.aspx?page=PageNo3827&flag=1

or Call Toll Free No. 155255 (or) 1800 4254 732

Mahindra Marazzo – A New Shark On Road

#Marazzo has been globally engineered by Mahindra Automotive North America Detroit & Mahindra Research Valley Chennai for a smooth ride, agile handling, the quietest cabin, fastest cooling comfort & luxurious space.

Continue reading “Mahindra Marazzo – A New Shark On Road”

It’s Mandatory for Insurance Coverage – 3 Years For Cars & 5 Years For Two Wheelers

With the Supreme Court refusing to extend the deadline, all new vehicles sold from 1st September 2018, should have mandatory third-party insurance coverage

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While considering a public interest litigation seeking guidelines for improving road safety filed by S. Rajaseekaran, Chairman & Head of Orthopedic Department, Ganga Hospital, Coimbatore, the bench comprising of Justice Madan B. Lokur and Justice Deepak Gupta, on 20th July, had ordered that third-party insurance coverage of three years for cars and five years for two-wheelers should be mandatory for all vehicles sold from September 1.

The direction was issued by the bench on the basis of decisions taken by the Supreme Court Committee on Road Safety, headed by former SC judge Justice K. S Radhakrishnan. The bench noted that in a meeting held by Committee on 26th March 2018, it was recorded that there are about 18 crore vehicles plying on the road and only about 6 crore vehicles have the mandatory third-party cover, which meant that 66% of the vehicles were plying without third party insurance.

The applications filed by General Insurance Council to extend the deadline were listed on 31st August. The bench dismissed the applications refusing to extend the deadline.

IRDA Circular

  • The Insurance Regulatory and Development Authority of India has issued a circular complying with the order of the top court. It reads:
  • Offer only three-year Motor Third-Party Insurance covers for new cars and five-year motor third party insurance policies for new two-wheelers.
  • The premium has to be collected for the entire term (three years or five years as the case may be) at the time of sale of insurance but would be recognised on a yearly basis. In other words, it shall be recognised for each year as 1/nof total premium as Gross Written Premium during that year where ‘n’ is the term of the policy. Thus, the premium for the year shall only be recognised as income and the remaining premium shall be treated as “Premium Deposit” or “Advance Premium”.
  • Currently, as far as Motor Own Damage Insurance is concerned, Package Policies (i.e. comprehensive covers) are available wherein two components are covered—Motor Third Party Liability and Motor Own Damage cover. After the introduction of long-term Motor Third-Party Insurance for new cars and new two-wheelers, an insured may be given the following two options:
  • Long-term Package cover offering both Motor Third-Party Insurance and Own Damage insurance for three years or five years as the case may be OR a bundled cover with a three-year or five-year term (as applicable) for the third party component and a one-year term for the Own Damage.Adobe_Post_20180902_171607.jpg
  • No Motor Third-Party Insurance may be cancelled by either the insurer or the insured except on the following grounds:
    Double Insurance
  • Vehicle not in use anymore because of Total Loss or Constructive Total Loss
    In the event the vehicle is sold and/or transferred

From a consumer’s perspective, long-term premium payments would substantially increase the initial outgo on purchase of new vehicles. Prima facie, the order will increase insurance penetration and will benefit insurance players. While it is still early days, we outline the dynamics of the third party motor insurance industry and how this move will impact growth and profitability of the insurers.

 

What is Insurance Underwriting? (General Insurance) – Shashi Kumar Aansoo

What is Insurance Underwriting?

Let’s take a look at the concept of underwriting.

“Underwriting is a core insurance function. It is a methodological approach to ensure that the insurance business is conducted on sound lines and that risks are evaluated for loss potential on both frequency and severity over a period of time.”

Underwriting is the process of:

  • Determining the level of risk presented by a proposer
  • Deciding whether to accept the proposal
  • Deciding the terms and price of the accepted proposal

Each underwriting decision involves balancing the insurer’s desire to earn premium often in competitive conditions with margins required to pay claims and expenses and also to ensure compliance with regulatory requirements. Underwriting is essential in all forms of insurance. For example, an automobile insurer will charge higher rates to young drivers, old models of vehicles, or may refuse coverage to drivers with a history of accidents. The underwriter may offer discounts for vehicles fitted with anti-theft devices. Fire insurers may inspect properties, offer reduced premiums for safety features such as sprinkler systems, and so on.

Understanding Risk Sharing

Understanding the concept of risk sharing or pooling will make it easier for you to understand the role of underwriting and risk classification in insurance.

All risks are not equal. For example, in the field of property and casualty insurance, wooden structures are at a greater risk of burning than stone structures. Therefore, a higher premium is required to insure a wooden structure. The same concept applies to life insurance. An individual with a serious illness such as cancer or diabetes is at a greater risk of premature death than an individual without the illness.

Since all risks are not equal, it would be inequitable to make all insured contribute the same amount. Thus, underwriting attempts to classify risks based upon their characteristics so that each insured in a specific class pays a premium in proportion to the risk involved.

The issue of fairness to the other participants is at the core of this risk classification (underwriting) process. When viewed from a perspective of fairness, proper risk classification becomes a central obligation of insurers to the policyholders who participate in their risk pools. This applies for all risks – life, assets or earnings.

Definition of Combined Ratio for Insurance Business

“Combined Ratio’

A measure of profitability used by an insurance company to indicate how well it is performing in its daily operations.

The combined ratio is defined as

The sum of incurred losses and operating expenses measured as a percentage of earned premium.

The combined ratio is comprised of the claims ratio and the expense ratio.

The claims ratio is claims owed as a percentage of revenue earned from premiums.

The expense ratio is operating costs as a percentage of revenue earned from premiums.

The combined ratio is calculated by taking the sum of incurred losses and expenses and then dividing them by earned premium.

It is a measure of the profitability of the insurer. (The ratio is typically expressed as a percentage.)

The combined ratio shows the underwriting profitability of the insurer. A ratio below 100% indicates that the company is making underwriting profit while a ratio above 100% means that it is paying out more money in claims that it is receiving from premiums.

‘Combined Ratio Calculated as:

“Combined Ratio”= “Incurred Loses + Expanses” /”Earned Premium”

 

Combined Ratio
Combined Ratio

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Eat That Frog : Six “P” formula

You may have heard of the six “P” formula. It says,

“Proper Prior Planning Prevents Poor Performance.”

I have found a simple truth. The ability to concentrate single-mindedly on your most important task, to do it well and to finish it completely, is the key to great success, achievement, respect, status and happiness in life.

(Moon+ Reader Pro v2.3.2, Eat That Frog)

Posted from WordPress for Android By Shashi Kumar Aansoo

Create a total life

So, how do you create a total life? Consider the following five key elements

Practice self-development

Self-development is a major theme throughout Drucker’s writings and teachings. “What matters,” he said, “is that the knowledge worker, by the time he or she reaches middle age, has developed and nourished a human being rather than a tax accountant or a hydraulic engineer.” Think about your life, both as it is now and where you’d like to be. Consider not just your work, but also your family, friends, interests, activities, and pursuits. Assess what’s working, what’s not, and what you might want to add or subtract to create more satisfaction and fulfillment.

Identify and develop your unique strengths

The concept of core competencies may have been created for organizations, but today it applies to individuals as well. Drucker urged people to consciously articulate their own strengths. Consider what’s unique about what you do, and in what areas you excel and contribute the most, both at work and outside of work. Focus on those strengths—your own core competencies—and find new ways to value and cultivate them. Odds are you can apply them to a variety of jobs, volunteer positions, and more.

Create a parallel or second career

Drucker said, “The purpose of the work on making the future is not to decide what should be done tomorrow, but what should be done today to have a tomorrow.” One unique idea he advocated was creating a “parallel career” in areas such as teaching, writing, or working in nonprofit organizations. He also encouraged developing a second career, often by doing similar work in a significantly different setting—a lawyer, for instance, might move from a traditional law firm to a legal nonprofit dedicated to a personally meaningful cause. While still in your main job, start thinking about your own possibilities for a parallel or second career. Consider how to match your values, experience, and education, and what shifts you might need to make in your life to support such changes.

Exercise your generosity

An essential part of living in more than one world, Drucker believed, is displaying a sense of generosity. Here, he said, “…everybody is a leader, everybody is responsible, everybody acts.” Sharing your time and talents by getting involved in volunteerism, social entrepreneurship, and mentoring not only provide opportunities to contribute, but also offer personal benefits, from broadening and deepening your life experience to expanding your circle of friends and colleagues. Think about what happens outside your workplace—in other industries, professions, and walks of life—and consider ways you can exercise your own generosity.

Teach and learn

Education plays a key role in Drucker’s vision of a strong, functioning society. He believed that knowledge workers should never stop learning. However, it’s up to them, he said, to incorporate continuous learning as a natural part of daily life— deciding what and how they’d like to learn and determining how they’ll build in the time. Consider your own priorities for learning, as well as how you learn best—taking classes, reading articles and books, asking or observing others, etc. You might also want to teach. As Drucker acknowledged, “No one learns as much as the person who must teach his subject.”

Start Where You Are

Drucker’s tenets can help you create a more satisfying and meaningful personal life and career. Here are seven tips for getting started:

Focus on achievement—not money

Drucker drew an important distinction between achievement and money. He suggested focusing on achievement and paying attention to how your successes, on and off the job, benefit both you and others. That doesn’t mean you shouldn’t or won’t make money, but that the pursuit of money ought to play a subordinate role.

Make time for thinking

Thinking is hard work, and in our fast-paced society, said Drucker, it is sorely devalued. The point, he urged, is to break from the daily grind and think about where you are and where you’re going. You might not have the desire or means

for Drucker’s suggested “week in the wilderness,” but surely you can carve out

an hour now and then for self-reflection. Take a walk, practice yoga or meditation, or enjoy nature.

Practice “systematic abandonment”

“People are effective because they say no…because they say, ‘This isn’t for me,’” declared Drucker. Practice what he called “systematic abandonment”—stepping back, at regular intervals, to determine which of your present activities can be scaled back or eliminated. Only then can you make way for something more fruitful, such as teaching, learning, or volunteering.

Volunteer your time and talent

Drucker saw volunteerism as essential to the smooth functioning of society, as well as a satisfying way of ensuring that work doesn’t consume your life. Today, there are hundreds of volunteering opportunities to choose from. Drucker’s recommendation was simple: Find an organization and cause you believe in—and get to work!

Become a mentor

Mentorship may be broader than just showing someone the ropes in a group or organization. It can include wide-ranging career and life advice, and as Drucker said, provide big benefits not only to the “mentee” but also to the mentor. If you’ve been guided by mentors of your own, pay it forward by mentoring others. If not, look for opportunities to both mentor and be mentored.

Learn the art of leisure

Drucker observed that “loafing” is easy, but “leisure” is difficult. As important as work is, avoid allowing it to be your only source of fulfillment. Find some outside interests; focus on things that may bring you pleasure, satisfaction, and a heightened sense of self-worth.

Be the CEO of your own life

Drucker saw self-management as an ongoing discipline, requiring self-knowledge, introspection, and personal responsibility. “In effect,” he said, “managing oneself demands that each knowledge worker think and behave like a chief executive officer.” Start now to think of yourself as the CEO of your own life and career. Take accountability for your decisions and actions. Know who you are, what is important to you, and how you will contribute at work and in the world.



Finally, take a deep breath and don’t expect everything to happen at once. Start

where you are and move towards your total life, one step at a time.

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What Is Respect?

What Is Respect?
Respect means a lot of different things. On a practical level it seems to include taking someone’s feelings, needs, thoughts, ideas, wishes and preferences into consideration. We might also say it means taking all of these seriously and giving them worth and value. In fact, giving someone respect seems similar to valuing them and their thoughts, feelings, etc. It also seems to include acknowledging them, listening to them, being truthful with them, and accepting their individuality and idiosyncrasies.

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Great Ways to Become Poor and Stay Poor

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Nobody plans to become poor and yet a great many people end up poor. Here are some of the best known ways of ensuring a life of penury:

1. ‘We don’t need no education…’

If you drop out of school or fail to achieve a basic education then you will severely restrict your chances of employment. What is more it is difficult to acquire further skills if you lack the basic ones. However this method does not guarantee poverty as there are some exceptional people who, because of sheer hard work or innate ability, succeed despite little formal education.

2. Develop an addiction.

Addictions are good ways to squander wealth and health. Cocaine and heroin are fast routes to perdition. Gambling works really well too.. The time-honoured choice is alcoholism which has ruined many a career and relationship. Yet there are exceptions. A tiny number of habitual gamblers win, some alcoholics can function for a long time. In the end the addiction usually wins.

3. Never save.

Savings help build wealth so a good plan for long-term poverty is to blow any extra earnings or bonuses on having a good time.

4. Borrow.

Borrowing to buy a house or get a degree can be an investment but borrowing for vacations, cars and general consumption is not very smart. A good way to beome penniless is to max out your credit cards and keep borrowing more until the repayments overwhelm you.

5. Go directly to jail.

A proven way to avoid success is to get involved in crime, particularly early in life, and end up in jail where you can waste the years that could have been spent acquiring an education and useful skills. Petty criminals find it hard to get jobs, build relationships or retain wealth. Of course some criminals end up rich but they risk being eliminated by rivals.

6. Stay in a dead-end low-paid job.

A low-paid job is fine if you really enjoy what you do or if it is a route to something better. But many people hate what they do and earn barely enough money to survive. They are reluctant to take a risk, to learn new skills or to try something new. They stay on a road that leads nowhere.

7. Avoid work altogether.

Some unfortunate people are too ill to work but many able bodied people make a decision to live on benefits and to avoid work. Perhaps they intend to marry a movie star or to win the lottery but working their way up is not part of the plan.

8. Be born in the third world.

If you are one of the millions born in very poor countries with no human rights, no education or healthcare and a repressive regime then you face enormous difficulties in escaping a life of poverty. Some do but the vast majority are condemned to extreme hardship.

If you are fortunate enough to live in a developed country then you need to avoid plans 1 to 7 above and then maybe do something to help those caught in number 8.

Who’s been India’s best and worst PM till date?

In coming few days, India will have a new Prime Minister. It’s as good a time as any to take stock of the men — and one woman — who have served us. Who’s been the best PM India’s had, and who’s done the most damage?
One Question always arrise that Who’s been India’s best and worst PM till date? According to me. The Failure and achievement we had seen in last decade is enough to decide. No doubt about it If we see our Past it is cristel clear that Mrs Indira Gandhi, Mr Rajiv Gandhi & Mr Atal Bihari Vajpayee remarked a wonderful performance except some of blot. Would that Our country did not faced The 1984 Sikh riots and the Bofors scam, the escorting of three terrorists to Kandahar by Jaswant Singh in exchange for hostage and Gujrat Burned. I think only this four Blot changed lots of thing in our country otherwise both Mr Rajiv Gandhi & Mr Atal Bihari Vajpayee are the best PM ever.
And yes…. Mr Manmohan Singh will be considered as India’s weakest most literate PM not due to his polite and humble nature but because of is appearance towards People I think the people of India never felt connected himself to Mr. PM and this is enough to define.
We do not need this time a Showpiece. Now we do not want to be happy with listing Opening Obama Speech we need such type of Leader in our country and this time it seems there are some like Me Rahul, Mr Advani, and yes Mr Modi is the best.
This is my view and I have right to say

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Future of our Planet: Artistic impression of a time hundred years from now

Photoshop contest : To imagine what would be left of some of the world’s major landmarks in hundreds of years, once civilization has ended.

Future of our Planet: Artistic impression of a time hundred years from now
Trafalgar Square, London

Future of our Planet: Artistic impression of a time hundred years from now

The Palace of Westminster, London

Future of our Planet: Artistic impression of a time hundred years from now

Tower Bridge, London

Future of our Planet: Artistic impression of a time hundred years from now

The Burj Al Arab, Dubai

Future of our Planet: Artistic impression of a time hundred years from now

Hong Kong harbour

Future of our Planet: Artistic impression of a time hundred years from now

Sydney Opera House, Australia

Future of our Planet: Artistic impression of a time hundred years from now
The Louvre, Paris, France

Future of our Planet: Artistic impression of a time hundred years from now

The Arc de Triomphe in Paris, France

Future of our Planet: Artistic impression of a time hundred years from now

Brandenburg Gate, Berlin, Germany

Future of our Planet: Artistic impression of a time hundred years from now

The Basilica of Superga, Turin, Italy

Future of our Planet: Artistic impression of a time hundred years from now

Giotto’s bell tower in Florence, Italy

Future of our Planet: Artistic impression of a time hundred years from now

Times Square, New York City

Future of our Planet: Artistic impression of a time hundred years from now

The Brooklyn Bridge, New York City

Future of our Planet: Artistic impression of a time hundred years from now

Cinderella Castle, Walt Disney World, Florida, US

Future of our Planet: Artistic impression of a time hundred years from now

Mount Rushmore, South Dakota, US