Category Archives: Kavita

यादें जम जाती है।

धूप भी खुल के कुछ नहीं कहती,
रात ढलती नहीं, थम जाती है !
सर्द मौसम की एक दिक्कत है ,
याद तक जम के बैठ जाती है..!

क़दम मिलाकर चलना होगा

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा.
कदम मिलाकर चलना होगा.

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढलना होगा.
कदम मिलाकर चलना होगा.

कुछ कांटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा.
क़दम मिलाकर चलना होगा.

May Your Day be Filled with Good Thoughts, Kind People, & Happy Moments

लहरों का निमंत्रण

तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण!

रात का अंतिम प्रहर है,
झिलमिलाते हैं सितारे,
वक्ष पर युग बाहु बाँधे
मैं खड़ा सागर किनारे

वेग से बहता प्रभंजन
केश-पट मेरे उड़ाता,

शून्य में भरता उदधि–
उर की रहस्यमयी पुकारें,

इन पुकारों की प्रतिध्वनि
हो रही मेरे हृदय में,
है प्रतिच्छायित जहाँ पर
सिंधु का हिल्लोल – कंपन!
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण!

विश्व की संपूर्ण पीड़ा
सम्मिलित हो रो रही है,
शुष्क पृथ्वी आँसुओं से
पाँव अपने धो रही है,

इस धरा पर जो बसी दुनिया
यही अनुरूप उसके–

इस व्यथा से हो न विचलित
नींद सुख की सो रही है,

क्यों धरणि अब तक न गलकर
लीन जलनिधि में गई हो?
देखते क्यों नेत्र कवि के
भूमि पर जड़-तुल्य जीवन?
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण!

जड़ जगत में वास कर भी
जड़ नहीं व्यवहार कवि का
भावनाओं से विनिर्मित
और ही संसार कवि का,

बूँद के उच्छ्वास को भी
अनसुनी करता नहीं वह,

किस तरह होता उपेक्षा-
पात्र पारावार कवि का,

विश्व-पीड़ा से, सुपरिचित
हो तरल बनने, पिघलने,
त्याग कर आया यहाँ कवि
स्वप्न-लोकों के प्रलोभन।
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण।

जिस तरह मरु के हृदय में
है कहीं लहरा रहा सर,
जिस तरह पावस-पवन में
है पपीहे का छिपा स्वर

जिस तरह से अश्रु-आहों से
भरी कवि की निशा में

नींद की परियाँ बनातीं
कल्पना का लोक सुखकर

सिंधु के इस तीव्र हाहा –
कार ने, विश्वास मेरा,
है छिपा रक्खा कहीं पर
एक रस-परिपूर्ण गायन!
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण।

नेत्र सहसा आज मेरे
तम-पटल के पार जाकर
देखते हैं रत्न-सीपी से
बना प्रासाद सुन्दर

है खड़ी जिसमें उषा ले,
दीप कुंचित रश्मियों का,

ज्योति में जिसकी सुनहरली
सिंधु कन्याएँ मनोहर

गूढ़ अर्थों से भरी मुद्रा
बनाकर गान करतीं
और करतीं अति अलौकिक
ताल पर उन्मत्त नर्तन!
तीर पर कैसे रुकूँ मैं
आज लहरों में निमंत्रण!

मौन हो गंधर्व बैठे
कर श्रवण इस गान का स्वर,
वाद्य-यंत्रों पर चलाते
हैं नहीं अब हाथ किन्नर,

अप्सराओं के उठे जो
पग उठे ही रह गए हैं,

कर्ण उत्सुक, नेत्र अपलक
साथ देवों के पुरन्दर

एक अद्भुत और अविचल
चित्र-सा है जान पड़ता,
देव बालाएँ विमानों से
रहीं कर पुष्प-वर्णन।
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण!

दीर्घ उर में भी जलधि के
हैं नहीं खुशियाँ समाती,
बोल सकता कुछ न उठती
फूल वारंवार छाती,

हर्ष रत्नागार अपना
कुछ दिखा सकता जगत को,

भावनाओं से भरी यदि
यह फफककर फूट जाती,

सिन्धु जिस पर गर्व करता
और जिसकी अर्चना को
स्वर्ग झुकता, क्यों न उसके
प्रति करे कवि अर्घ्य अर्पण।
तीर पर कैसे रुकूँ में
आज लहरों में निमंत्रण!

आज अपने स्वप्न को मैं
सच बनाना चाहता हूँ,
दूर की इस कल्पना के
पास जाना चाहता हूँ,

चाहता हूँ तैर जाना
सामने अंबुधि पड़ा जो,

कुछ विभा उस पार की
इस पार लाना चाहता हूँ,

स्वर्ग के भी स्वप्न भू पर
देख उनसे दूर ही था,

किन्तु पाऊँगा नहीं कर
आज अपने पर नियंत्रण।
तीर पर कैसे रुकूँ मैं
आज लहरों में निमंत्रण,

लौट आया यदि वहाँ से
तो यहाँ नव युग लगेगा,
नव प्रभाती गान सुनकर
भाग्य जगती का जगेगा,

शुष्क जड़ता शीघ्र बदलेगी
सरल चैतन्यता में,

यदि न पाया लौट, मुझको
लाभ जीवन का मिलेगा,

पर पहुँच ही यदि न पाया
व्यर्थ क्या प्रस्थान होगा?
कर सकूँगा विश्व में फिर-
भी नए पथ का प्रदर्शन!
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण!

१०

स्थल गया है भर पथों से
नाम कितनों के गिनाऊँ,
स्थान बाकी है कहाँ पथ
एक अपना भी बनाऊँ?

विश्व तो चलता रहा है
थाम राह बनी-बनाई

किंतु इनपर किस तरह मैं
कवि-चरण अपने बढ़ाऊँ?

राह जल पर भी बनी है,
रूढ़ि, पर, न हुई कभी वह,

एक तिनका भी बना सकता
यहाँ पर मार्ग नूतन!
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण!

११

देखता हूँ आँख के आगे
नया यह क्या तमाशा –
कर निकलकर दीर्घ जल से
हिल रहा करता मना-सा,

है हथेली-मध्य चित्रित
नीर मग्नप्राय बेड़ा!

मैं इसे पहचानता हूँ,
हैं नहीं क्या यह निराशा?

हो पड़ी उद्दाम इतनी
उर-उमंगे, अब न उनको
रोक सकता भय निराशा का,
न आशा का प्रवंचन।
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण!

१२

पोत अगणित इन तरंगों ने
डुबाए मानता मैं,
पार भी पहुँचे बहुत-से —
बात यह भी जानता मैं,

किन्तु होता सत्य यदि यह
भी, सभी जलयान डूबे,

पार जाने की प्रतिज्ञा
आज बरबस ठानता मैं,

डूबता मैं, किंतु उतराता
सदा व्यक्तित्व मेरा
हों युवक डूबे भले ही
है कभी डूबा न यौवन!
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण!

१३

आ रहीं प्राची क्षितिज से
खींचने वाली सदाएँ,
मानवों के भाग्य-निर्णायक
सितारों! दो दुआएँ,

नाव, नाविक, फेर ले जा,
हैं नहीं कुछ काम इसका,

आज लहरों से उलझने को
फड़कती हैं भुजाएँ

प्राप्त हो उस पार भी इस
पार-सा चाहे अंधेरा,
प्राप्त हो युग की उषा
चाहे लुटाती नव किरन-धन!
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण!

:- हरिवंशराय बच्चन

एक भी आँसू न कर बेकार

एक भी आँसू न कर बेकार –
जाने कब समंदर मांगने आ जाए!

पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है,
यह कहावत है, अमरवाणी नहीं है,
और जिस के पास देने को न कुछ भी
एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है,

कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार
जाने देवता को कौनसा भा जाय!

चोट खाकर टूटते हैं सिर्फ दर्पण
किन्तु आकृतियाँ कभी टूटी नहीं हैं,
आदमी से रूठ जाता है सभी कुछ –
पर समस्यायें कभी रूठी नहीं हैं,

हर छलकते अश्रु को कर प्यार –
जाने आत्मा को कौन सा नहला जाय!

व्यर्थ है करना खुशामद रास्तों की,
काम अपने पाँव ही आते सफर में,
वह न ईश्वर के उठाए भी उठेगा –
जो स्वयं गिर जाय अपनी ही नज़र में,

हर लहर का कर प्रणय स्वीकार –
जाने कौन तट के पास पहुँचा जाए!

  • रामावतार त्यागी

माँ तुझे भेंट करेंगे ये आज़ादी

माँ तुझे भेंट करेंगे ये आज़ादी 
इस 70वीं साल की आज़ादी 
हमें देनी है आज़ादी 
इस गन्दगी से आजादी 
इस बंदगी से आज़ादी 
हर नफरतों से आज़ादी 
दकियानूसी सोचों से आजादी 
आरामतलबी से आज़ादी 
छोटी सोच से आज़ादी 
लाल फीताशाही से आज़ादी 
झूठे वादों से आज़ादी 
कर्तव्यहीनता से आज़ादी 
कृतघ्नता से आज़ादी 
हम छीन के देंगे आजादी 
भारत माँ को आज़ादी 
हर बाधाओं से आज़ादी 
हर रुकावटो से आज़ादी 
टूटे हौसला से आजादी 
बस बहुत जी ली हमने आज़ादी 
माँ अब तुझे देंगे ये आज़ादी।।
by 
शशि कुमार

माँ तुझे भेंट करेंगे ये आज़ादी.jpg

I want to know | The Invitation | By Oriah

It doesn’t interest me
what you do for a living.

I want to know
what you ache for
and if you dare to dream
of meeting your heart’s longing.

It doesn’t interest me
how old you are.

I want to know
if you will risk
looking like a fool
for love
for your dream
for the adventure of being alive.

It doesn’t interest me
what planets are
squaring your moon…

I want to know
if you have touched
the centre of your own sorrow
if you have been opened
by life’s betrayals
or have become shrivelled and closed
from fear of further pain.

I want to know
if you can sit with pain
mine or your own
without moving to hide it
or fade it
or fix it.

I want to know
if you can be with joy
mine or your own
if you can dance with wildness
and let the ecstasy fill you
to the tips of your fingers and toes
without cautioning us
to be careful
to be realistic
to remember the limitations
of being human.

It doesn’t interest me
if the story you are telling me
is true.

I want to know if you can
disappoint another
to be true to yourself.

If you can bear
the accusation of betrayal
and not betray your own soul.

If you can be faithless
and therefore trustworthy.
I want to know if you can see Beauty
even when it is not pretty
every day.

And if you can source your own life
from its presence.
I want to know
if you can live with failure
yours and mine
and still stand at the edge of the lake
and shout to the silver of the full moon,
“Yes.”
It doesn’t interest me
to know where you live
or how much money you have.

I want to know if you can get up
after the night of grief and despair
weary and bruised to the bone
and do what needs to be done
to feed the children.

It doesn’t interest me
who you know
or how you came to be here.
I want to know if you will stand
in the centre of the fire
with me
and not shrink back.

It doesn’t interest me
where or what or with whom
you have studied.
l
I want to know
what sustains you
from the inside
when all else falls away.

I want to know
if you can be alone
with yourself
and if you truly like
the company you keep
in the empty moments.

By Oriah © Mountain Dreaming,
from the book The Invitation
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Posted from WordPress for Android By Shashi Kumar Aansoo

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