फ़िक़्र की धूप में

क्यूँ तुझको लग रहा है कि तुझसे ज़ुदा हूँ मैं
मुझमें तू ख़ुद को देख तेरा आईना हूँ मैं

ऐ दिल सभी ने तोड़ दिया है यक़ीन तेरा
दुनिया की बात क्या करूँ ख़ुद से ख़फ़ा हूँ मैं

बस तेरा आसरा है मुझे ऐ मेरे ख़ुदा
सजदे में तेरे हर घड़ी महवे-दुआ हूँ मैं

अल्लाह रे ज़माना-ए-हाज़िर का क्या करें
हर शख़्स कह रहा है यहाँ पर ख़ुदा हूँ मैं

तेरे बग़ैर मैं तो अधूरी थी शायरी
पहचान हुई ख़ुद से ये जाना सिया हूँ मैं

सिया सचदेव

वो नही मिला तो मलाल क्या जो गुज़र गया सो गुज़र गया – बशीर बद्र

मैंने कुछ ज्यादा पढ़ा नहीं और ज्यादा सुना भी नहीं पर जब जब सुना मैं मंत्रमुग्ध सा होता रहा। मैं शायद हीं किसी शायर को जान पाया और अब दिली ख्वाहिश है की उन सबों को पढ़ूँ और जहां जहां रत्न पड़े है उसे आत्मसात करता रहूँ ।

ये गज़ल बशीर बद्र ने लिखी है और मुझे बेहद पसंद है जो नहीं मिला उसका मलाल क्या जो गुज़र गया वो गुज़र गया. किस्सा बहुत है ज़िन्दगी की चलो पढ़ते हैं और आगे बढ़ते हैं.

आज कल सारा जहाँ लॉक डाउन के वज़ह से सब घर में जकरे पड़े हैं तो चलिए कुछ गोया ग़ज़ल वाजी भी हो जाये जो पसंद है उसे अंकित किये जाएँ.

वो नही मिला तो मलाल क्या, जो गुज़र गया सो गुज़र गया
उसे याद करके ना दिल दुखा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

ना गिला किया ना ख़फ़ा हुए, युँ ही रास्ते में जुदा हुए
ना तू बेवफ़ा ना मैं बेवफ़ा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

तुझे एतबार-ओ-यकीं नहीं, नहीं दुनिया इतनी बुरी नहीं
ना मलाल कर, मेरे साथ आ, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

वो वफ़ाएँ थीं, के जफ़ाएँ थीं, ये ना सोच किस की ख़ताएँ थीं
वो तेरा हैं, उसको गले लगा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

वो ग़ज़ल की कोई किताब था , वो गुलों में एक गुलाब था
ज़रा देर का कोई ख़्वाब था, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

मुझे पतझड़ों की कहानियाँ, न सुना सुना के उदास कर
तू खिज़ाँ का फूल है, मुस्कुरा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

वो उदास धूप समेट कर कहीं वादियों में उतर चुका
उसे अब न दे मिरे दिल सदा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

ये सफ़र भी किताना तवील है , यहाँ वक़्त कितना क़लील है
कहाँ लौट कर कोई आएगा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

कोई फ़र्क शाह-ओ-गदा नहीं, कि यहाँ किसी को बक़ा नहीं
ये उजाड़ महलों की सुन सदा , जो गुज़र गया सो गुज़र गया