अभी भी जिंदा हूँ – एक कविता

माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।
पर देख ये सब शर्मिंदा हूँ।।

कहने को बहुत प्रोग्रेसिव हूँ
पर सच में बहुत निगेटिव हूँ।
जब देखता हूँ तेरे आँगन को
मन हीं मन बहुत घबराता हूँ।

कोविड से लड़ते सब दुःख सहते,
पथरीले पथ पर अविरल चलते
माँ को ढोते निढाल सपनों को

देख ये सब बहुत शर्मिंदा हूँ।
माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।

कुछ निखट निपोरे प्रयत्नों को
देख कर सियासी सब यत्नो को
सड़क पर चलते धुप में जलते
हालत के मारे हम वतनों को

देख ये सब बहुत शर्मिंदा हूँ।
माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।

ये नुका छिपी और दाव पेंच मे
तिल-तिल कर मरते तेरे रत्नों को
सह और मात के खुराफात मे
गर्त में डूबते का सब संयंत्रो को

देख ये सब बहुत शर्मिंदा हूँ।
माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।

भूखे मदद की गुहार लगाते
सियासत दनों के ताल पर नचते
अपनी कल की राह को तकते
आशाओं का बस एक पुलिंदा हूँ

माँ देख अभी भी जिंदा हूँ।
माँ देख अभी भी जिंदा हूँ।।

©शशि कुमार ‘आँसू’

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The 21-day lockdown, which came into force on Wednesday, has triggered an exodus of migrant workers from many cities.Credit – Business Standard Private Ltd. 
Heartbreaking visuals: A little boy fell asleep on a suitcase as his migrant parents take a long journey home from Punjab to Uttar Pradesh https://t.co/HcGEFRCKI4

ज़रा फ़ासले से रहा करें

कोई हाथ भी अब न बढ़ाएगा बस कहिये ‘नमस्ते’ तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से रहा करें।।

कोरोना! तुम कल आना

आज वक़्त यकीं से आगे निकलना चाहता है।
एक कोरोना सम्पूर्ण सृजन को निगलना चाहता है।।
एक व्याधि इस अलौकिक लोक मे विध्वंस लाना चाहता है।।
एक कोरोना सम्पूर्ण सृजन को निगलना चाहता है।।

ये मुश्किल की घड़ी है, सुरसा मुहँ बाएं खड़ी है!
हर शख़्स बेहाल है, मानवता बेसुध-बेज़ान पड़ी है।
उपर से ये खूदगर्ज अश्क! हमे हमसे हीं बहाने पर अड़ी है।।

हर तरफ दिल ना-उम्मीद और मन हैरां सा है!
वसुधैव कुटुम्ब स्तब्ध! हर अक्स परेशां सा है!
ऋतम्बरा भी क्षुब्ध है, क्षितिज रुआँसा सा है।
हवा बाहर की कातिल है। हर शख़्स डरा-सहमा सा है!

एक विषाणु देह की दहलीज़ हमारी लांघ कर,
धधकते दिलो की धडकनों पर पहरा लगाना चाहता है।
एक कोरोना सम्पूर्ण सृजन को निगलना चाहता है।।

खिज़ा सुर्ख है इंसा परेशान ज़िंदगी हैरान है !
चीखता मूक नाद है गली-सड़क सब वीरान है
सब कुछ बंद है स्कूल, दफ्तर और न दुकान है ।।

कैसा मंज़र है! सृजन के दरवाजे पर ताला हैं।
हर तरफ सिहरन है खौफ का शाया काला हैं।
सबको सबसे खतरें हैं! फ़िज़ा में कोरोना का जाला हैं।।

वक्त पहिया रोककर, हमारी सब्र का इम्तिहान लेना चाहता है।
बड़ा निर्दयी कातिल है ये हमें हमसे हीं दूर करना चाहता है।
एक कोरोना सम्पूर्ण धरा को काल के गाल में समाना चाहता है ।।
आज वक़्त यकीं से आगे निकलना चाहता है।
एक कोरोना सम्पूर्ण सृजन को निगलना चाहता है।।

मेरी हमनफस, मेरे अज़ीज़, मेरे मोहसिन
तू क्यूँ परेशान है! तू परेशां ना हो।
माना लंबी मुश्किल की हैं इक्कीस रातें, मगर रात हीं तो है!
ये भी गुज़र जायगा, तेरा साथ, मेरे साथ हीं तो है।

हाँ मंज़र खौफनाक है, पर ये सच्चाई नहीं जाने वाली,
यकीं कर खुदा है तो उसकी खुदायी नहीं जाने वाली।।
गर मन में तेरे राम हैं तो दुआ ये तेरी खाली नहीं जाने वाली ।।

गर नजदीकियों की ख्वाहिश है तो अभी की दूरियाँ कबूल कर
कोरोनाकाल से पार पाना है तो ये लॉकडाउन की मजबूरियां मंज़ूर कर ।
स्वच्छता संक्रमण से लड़ने का अंतिम अस्त्र है तो ये अस्त्र पर गुरुर कर ।।

मेरे यार, मेरे दोस्त, मेरे दुश्मन, मेरे हमवतन
इस वीरान हुए वक्त मे तुम गुलमुहर बन जा।
घर पर रह और घर को और गुलजार किए जा।
प्यार है तो प्यार कर, इश्क है तो इज़हार किए जा।।

रोक ले विघ्न-बाण ये जो धमनियों को गलाना चाहता है.
रुक जा! ठहर जा! आज वक़्त! आगे निकलना चाहता है।
एक कोरोना आज सम्पूर्ण सृजन को निगलना चाहता है।।

*** शब्दार्थ
सुरसा – सुरसा रामायण के अनुसार समुद्र में रहने वाली नागमाता थी। सीताजी की खोज में समुद्र पार करने के समय सुरसा ने राक्षसी का रूप धारण कर हनुमान का रास्ता रोका था और उन्हें खा जाने के लिए उद्धत हुई थी।
खिज़ा पतझड़ की ऋतु । अवनति का समय ।
सुर्ख – लाल (जैसे—सुर्ख़ गाल)।
मूक नाद – लाचार शब्द, ध्वनि
वसुधैव कुटुम्ब – सारी पृथ्वी एक परिवार
स्तब्ध – सुन्न, निश्चेष्ट
ऋतम्बरा – सदा एक समान रहने वाली सात्विक और निर्मल बुद्धि।
क्षितिज – Horizon पृथ्वीतल के चारों ओर की वह कल्पित रेखा या स्थान जहाँ पर पृथ्वी और आकाश एक दूसरे से मिलते हुए से जान पड़ते हैं