KYA PAA LI TUNE AAZADI (POEM) BY SHASHI KUMAR AANSOO

क्या पा ली तेरी तूने आज़ादी!
क्या छिन के ली तूने आज़ादी?

तय तो करो कैसी हो आज़ादी!
किस बात की चाहिए आज़ादी?

क्या ख़ुद की बंदगी से आज़ादी !
या मन की गंदगी से आज़ादी !!

क्या बेसुमार नफरतों से आज़ादी !
या दकियानूसी सोचों से आजादी!!

क्या तेरी झूठे वादों से आज़ादी !
या तेरी टुच्ची इरादों से आज़ादी !!

क्या तेरी कर्तव्यहीनता से आज़ादी !
या तेरी बेसुमार कृतघ्नता से आज़ादी !!

क्या तेरी अनुशासनहीनता से आज़ादी!
या तेरी कोरी कपट बहानो से आज़ादी!!

क्या राह मे बिछी बाधाओं से आज़ादी !
या मेहनतकश आशाओं से आज़ादी !!

क्या पतंग का अपने डोर से आज़ादी!
या उसके बाधाओं के छोर से आजादी!!

कहते हो छिन के लेंगे मेरी आज़ादी?
कहो क्या पा ली ये सब से आज़ादी!!

लेखक – शशि कुमार आँसू @shashiaansoo

अभी भी जिंदा हूँ – शशि कुमार आँसू

माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।
पर देख ये सब शर्मिंदा हूँ।।

कहने को बहुत प्रोग्रेसिव हूँ
पर सच में बहुत निगेटिव हूँ।
जब देखता हूँ तेरे आँगन को
मन हीं मन बहुत घबराता हूँ।

कोविड से लड़ते सब दुःख सहते,
पथरीले पथ पर अविरल चलते
माँ को ढोते निढाल सपनों को

देख ये सब बहुत शर्मिंदा हूँ।
माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।

कुछ निखट निपोरे प्रयत्नों को
देख कर सियासी सब यत्नो को
सड़क पर चलते धुप में जलते
हालत के मारे हम वतनों को

देख ये सब बहुत शर्मिंदा हूँ।
माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।

ये नुका छिपी और दाव पेंच मे
तिल-तिल कर मरते तेरे रत्नों को
सह और मात के खुराफात मे
गर्त में डूबते का सब संयंत्रो को

देख ये सब बहुत शर्मिंदा हूँ।
माँ देख अभी मैं जिंदा हूँ।

भूखे मदद की गुहार लगाते
सियासत दनों के ताल पर नचते
अपनी कल की राह को तकते
आशाओं का बस एक पुलिंदा हूँ

माँ देख अभी भी जिंदा हूँ।
माँ देख अभी भी जिंदा हूँ।।

©शशि कुमार ‘आँसू’

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The 21-day lockdown, which came into force on Wednesday, has triggered an exodus of migrant workers from many cities.Credit – Business Standard Private Ltd. 
Heartbreaking visuals: A little boy fell asleep on a suitcase as his migrant parents take a long journey home from Punjab to Uttar Pradesh https://t.co/HcGEFRCKI4

मैं कैसे तुझको याद करूँ – शशि कुमार आँसू

Simpi Shashi Singh Happy 15th Anniversary

मैं कैसे तुझको याद करूँ,
तुझे देखूं या बात करूँ।
मैं कैसे तुझे याद करूँ।।

वो बातेँ जब याद आती है
रोयां रोयां खील जाता है

मैं तन्हा सूरज तकता था!
एक रोज़ अचानक तू आयी!
क्या उस पल का अहसास धरूँ
मैं कैसे तुझे याद करूँ।।

कैसे मैं तुझको याद करूँ,
पंद्रह बसंत लो अब बीत गये,
जब मिले थे कितने कच्चे थे!
हाँ-हाँ शायद हम बच्चे थे।

अब कैसी हो क्या बात करूँ!
बस वैसी हो जिसके साथ रहूँ ।

तेरी आँखे आज भी वैसी है
बस कच्ची कैरी की जैसी है।
इठलाती हुई बलखाती हुई
महकाती हुई दमकाती हुई।

जब-जब तुम काज़ल करती हो
तन मन घायल हो जाता है,

बन ठन कर जब तुम चलती हो
मन फिर पागल हो जाता है।

मैं कैसे तुझको याद करूँ,
मुस्काती हुई, भरमाती हुई,
कभी गाती हुई , शर्माती हुई,
कभी धीरे से सुर्ख होठों से
‘आँसू’ कहके बुलाती हुई

जब जब बाल में रुके बूंदों को,
बल खाके तुम झटकती हो,
सच कहता हूँ मर जाता …
जब मुड़कर तुम मुस्काती हो।

मैं कैसे तुझको याद करूँ,
पल-पल में तुम रग-रग में तुम
नींदों में तुम सपनों में तुम,
मैं चाहता तुमको
सिर्फ हूँ।
में माँगता तुमको
सिर्फ हूँ।

मैं कैसे तुझको याद करूँ,
तुमसे लड़ूँ या तुझे प्यार करूँ,
किस आनंद का साक्षात्कार करूँ
।।

तेरी बातें तेरे गोरे गाल सी है,
गुस्से में वो सुर्ख लाल सी है।
मैं गेंदा जैसा खीला हुआ,
तुम गुलमुहर कमाल सी है।

तुम कहो तुझे मैं क्यूँ याद करूँ!
बस तेरे साथ जीऊँ रोमांस करूँ
हर क्षण हर पल तेरे साथ रहूँ
तेरे साथ जीऊँ तेरे साथ मरूँ।


© शशि कुमार ‘आँसू ‘

I Love You SIMPI SINGH

Happy 15th Anniversary
Simpi Shashi Singh & Shashi Kumar Aansoo

माँ! तुम होती तो कैसा होता – शशि कुमार आँसू

माँ! तुम होती तो कैसा होता
आज मैं भी इठला रहा होता।

मैंने हर जगह ढूंढा तुमको
कभी तेरे किताबों के पन्नों मे
कभी तेरे छोड़ गए गहनों मे
कभी तेरे अधूरे लिखे लब्ज़ो में
कभी तेरी मनमोहनी किस्सों मे ।

मैंने हर जगह ढूंढा तुमको
पर तुम मुझे कहीं ना मिली!

क्या था जो मुझको तज़ गयी
क्या बस एक दिवस का साथ था!
तुम यूँ क्यूँ पंचतत्तव मे बिखर गयी!
किस भरोसे छोड़ तुम ऊपर चली गयी!

क्या कुछ मातृत्व से बेहतर मिल गया
क्यों काल तुम्हें मुझसे यूँ छीन गया!
भगवान थे! रुक जाते वो!
कहती तो शायद झूक जाते वो

क्या उनको ये मालूम न था?
उनके रचे इस लोक में,
कैसे माँ के बिन जिऊँगा मैं
तानो से भरे बिघ्न दंश में,
कितनी रुदन सहूंगा मैं।

माँ! तुम ही अब कहो यहाँ
किस किस को माँ कहूँगा मैं।

क्या मुझमें कोई कमी रही
क्या मुझसे तुम नाराज थी
बस जन्म दिन और चल दिये
क्या देखने की जिद्द न थी!
या दिखलाने की मर्म न था!

माँ! तुम होती तो कैसा होता
माँ! तुम होती तो कैसा होता

माँ! ये कौन सा नसीब है!
न तु है! न तेरी तस्वीर है!
शिकवा है पर उस रब से है
माँ! तुझसे कोई गीला नहीं।

तुम लड़ गयी होगी काल से
जब मैं भी तुझे मिला नहीं।

माँ! मैं सबसे अक्सर पूछता हूँ
तेरी शक्लों सूरत कैसी थी?
बस लोग अक्सर कहते हैं,
तेरी आंखे बस मेरी जैसी थी।

यूं तो लबरेज थी पानी से पर
बरसात में नाचती मोरनी सी थी।

माँ! तुम होती तो अच्छा होता
सच! मैं आज इठला रहा होता।

कोरोना! तुम कल आना – शशि कुमार आँसू

आज वक़्त यकीं से आगे निकलना चाहता है।
एक कोरोना सम्पूर्ण सृजन को निगलना चाहता है।।
एक व्याधि इस अलौकिक लोक मे विध्वंस लाना चाहता है।।
एक कोरोना सम्पूर्ण सृजन को निगलना चाहता है।।

ये मुश्किल की घड़ी है, सुरसा मुहँ बाएं खड़ी है!
हर शख़्स बेहाल है, मानवता बेसुध-बेज़ान पड़ी है।
उपर से ये खूदगर्ज अश्क! हमे हमसे हीं बहाने पर अड़ी है।।

हर तरफ दिल ना-उम्मीद और मन हैरां सा है!
वसुधैव कुटुम्ब स्तब्ध! हर अक्स परेशां सा है!
ऋतम्बरा भी क्षुब्ध है, क्षितिज रुआँसा सा है।
हवा बाहर की कातिल है। हर शख़्स डरा-सहमा सा है!

एक विषाणु देह की दहलीज़ हमारी लांघ कर,
धधकते दिलो की धडकनों पर पहरा लगाना चाहता है।
एक कोरोना सम्पूर्ण सृजन को निगलना चाहता है।।

खिज़ा सुर्ख है इंसा परेशान ज़िंदगी हैरान है !
चीखता मूक नाद है गली-सड़क सब वीरान है
सब कुछ बंद है स्कूल, दफ्तर और न दुकान है ।।

कैसा मंज़र है! सृजन के दरवाजे पर ताला हैं।
हर तरफ सिहरन है खौफ का शाया काला हैं।
सबको सबसे खतरें हैं! फ़िज़ा में कोरोना का जाला हैं।।

वक्त पहिया रोककर, हमारी सब्र का इम्तिहान लेना चाहता है।
बड़ा निर्दयी कातिल है ये हमें हमसे हीं दूर करना चाहता है।
एक कोरोना सम्पूर्ण धरा को काल के गाल में समाना चाहता है ।।
आज वक़्त यकीं से आगे निकलना चाहता है।
एक कोरोना सम्पूर्ण सृजन को निगलना चाहता है।।

मेरी हमनफस, मेरे अज़ीज़, मेरे मोहसिन
तू क्यूँ परेशान है! तू परेशां ना हो।
माना लंबी मुश्किल की हैं इक्कीस रातें, मगर रात हीं तो है!
ये भी गुज़र जायगा, तेरा साथ, मेरे साथ हीं तो है।

हाँ मंज़र खौफनाक है, पर ये सच्चाई नहीं जाने वाली,
यकीं कर खुदा है तो उसकी खुदायी नहीं जाने वाली।।
गर मन में तेरे राम हैं तो दुआ ये तेरी खाली नहीं जाने वाली ।।

गर नजदीकियों की ख्वाहिश है तो अभी की दूरियाँ कबूल कर
कोरोनाकाल से पार पाना है तो ये लॉकडाउन की मजबूरियां मंज़ूर कर ।
स्वच्छता संक्रमण से लड़ने का अंतिम अस्त्र है तो ये अस्त्र पर गुरुर कर ।।

मेरे यार, मेरे दोस्त, मेरे दुश्मन, मेरे हमवतन
इस वीरान हुए वक्त मे तुम गुलमुहर बन जा।
घर पर रह और घर को और गुलजार किए जा।
प्यार है तो प्यार कर, इश्क है तो इज़हार किए जा।।

रोक ले विघ्न-बाण ये जो धमनियों को गलाना चाहता है.
रुक जा! ठहर जा! आज वक़्त! आगे निकलना चाहता है।
एक कोरोना आज सम्पूर्ण सृजन को निगलना चाहता है।।

*** शब्दार्थ
सुरसा – सुरसा रामायण के अनुसार समुद्र में रहने वाली नागमाता थी। सीताजी की खोज में समुद्र पार करने के समय सुरसा ने राक्षसी का रूप धारण कर हनुमान का रास्ता रोका था और उन्हें खा जाने के लिए उद्धत हुई थी।
खिज़ा पतझड़ की ऋतु । अवनति का समय ।
सुर्ख – लाल (जैसे—सुर्ख़ गाल)।
मूक नाद – लाचार शब्द, ध्वनि
वसुधैव कुटुम्ब – सारी पृथ्वी एक परिवार
स्तब्ध – सुन्न, निश्चेष्ट
ऋतम्बरा – सदा एक समान रहने वाली सात्विक और निर्मल बुद्धि।
क्षितिज – Horizon पृथ्वीतल के चारों ओर की वह कल्पित रेखा या स्थान जहाँ पर पृथ्वी और आकाश एक दूसरे से मिलते हुए से जान पड़ते हैं

Thori Der Sath Chalo

 

Thori Der Sath Chalo

Kathin Hai Rah Gujar ‘Simpi’ Thori Der Sath Chalo
Bahut Kara Hai Safar,Bas tum Thori Der Sath Chalo

Tamam Umra Kahan Koei Sath Deta Hai
Ye Janta hun Magar Bas Tum Thori Der Sath Chalo

Nashe Me Chur Hun Main Bhi Tumhe Bhi Hosh Nahi
Bada Maja Ho Agar Tum Thori Der Sath Chalo

Ye Ek Sab Ki Mulakat Bhi Ganimat Hai
‘Simpi’ Yahan kise Hai Kal Ki Khabar
Bas Tum Thori Der Sath Chalo

Ye Janta Hun Kaun Yahan Tamam Umra
Sath Deta Hai
Par Tu To Meri Zindgi Ho
Bas Tum Thori Der Sath Chalo