मज़दूर हूँ मैं – प्रभाकर “प्रभू”

आज के हालात पर एक कविता जो की प्रभाकर कुमार ने लिखी है
कृप्या पूरा पढ़ें और शेयर जरूर करें।

ना बेबस और ना लाचार हूँ
हाँ मगर गरीबी पे सवार हूँ
मेहनत ही अपना परिचय है

पर ये अच्छा नहीं समय है
वर्षों का दस्तूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

जो लहू हमारा लगता है
तो पसीना आपको दिखता है

बहुत किया है हमने काम
और बदले में दिया सलाम
भूख के हाथों मज़बूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

हमारा ना कोई सपना है
कब जीना कब मरना है
ठिकाना अपना एक नहीं
जीने का मौक़ा अनेक नहीं

मरा हुआ जीवित जरूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

मन में एक सवाल है साहेब
ये कैसा बवाल है साहेब
घर परिवार को छोड़ा है
कसमें वादे सब तोड़ा है
एक सपना देकर आया था
एक वक़्त ही रोटी खाया था
एक साड़ी एक खिलौना है
जिसको घर तक ढोना है
पास नहीं है मेरे पैसे
तो फिर घर जाऊँगा कैसे
घर मेरे पहुँचा दो साहेब
टिकेट एक करवा दो साहेब
खा रहा हूँ ठोकर कब से
विनती कर रहा हूँ सब से
कोई नहीं मेरी सुनता है
बस दूर रहो ये कहता है
जाने क्या कहती है सरकार
ये भी वो भी है अधिकार

पर शायद उनको दिखता नहीं
और कोई उनको कहता नहीं
देखो पास मेरे क्या आया है
पुलिस का डंडा ही खाया है
गलती क्या है जो मज़दूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

©प्रभाकर “प्रभू” – Writer, Poet, Actor

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