सखि, वे मुझसे कहकर जाते (यशोधरा)

सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?

           मुझको बहुत उन्होंने माना
           फिर भी क्या पूरा पहचाना?
           मैंने मुख्य उसी को जाना
           जो वे मन में लाते।

सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

           स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
           प्रियतम को, प्राणों के पण में,
           हमीं भेज देती हैं रण में -
           क्षात्र-धर्म के नाते।

सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

           हुआ न यह भी भाग्य अभागा,
           किसपर विफल गर्व अब जागा?
           जिसने अपनाया था, त्यागा;
           रहे स्मरण ही आते!

सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

           नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
           पर इनसे जो आँसू बहते,
           सदय हृदय वे कैसे सहते?
           गये तरस ही खाते!

सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

           जायें, सिद्धि पावें वे सुख से,
           दुखी न हों इस जन के दुख से,
           उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से?
           आज अधिक वे भाते!

सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

           गये, लौट भी वे आवेंगे,
           कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे,
           रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
           पर क्या गाते-गाते?

सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

  • मैथिलीशरण गुप्त

मज़दूर हूँ मैं – प्रभाकर “प्रभू”

आज के हालात पर एक कविता जो की प्रभाकर कुमार ने लिखी है
कृप्या पूरा पढ़ें और शेयर जरूर करें।

ना बेबस और ना लाचार हूँ
हाँ मगर गरीबी पे सवार हूँ
मेहनत ही अपना परिचय है

पर ये अच्छा नहीं समय है
वर्षों का दस्तूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

जो लहू हमारा लगता है
तो पसीना आपको दिखता है

बहुत किया है हमने काम
और बदले में दिया सलाम
भूख के हाथों मज़बूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

हमारा ना कोई सपना है
कब जीना कब मरना है
ठिकाना अपना एक नहीं
जीने का मौक़ा अनेक नहीं

मरा हुआ जीवित जरूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

मन में एक सवाल है साहेब
ये कैसा बवाल है साहेब
घर परिवार को छोड़ा है
कसमें वादे सब तोड़ा है
एक सपना देकर आया था
एक वक़्त ही रोटी खाया था
एक साड़ी एक खिलौना है
जिसको घर तक ढोना है
पास नहीं है मेरे पैसे
तो फिर घर जाऊँगा कैसे
घर मेरे पहुँचा दो साहेब
टिकेट एक करवा दो साहेब
खा रहा हूँ ठोकर कब से
विनती कर रहा हूँ सब से
कोई नहीं मेरी सुनता है
बस दूर रहो ये कहता है
जाने क्या कहती है सरकार
ये भी वो भी है अधिकार

पर शायद उनको दिखता नहीं
और कोई उनको कहता नहीं
देखो पास मेरे क्या आया है
पुलिस का डंडा ही खाया है
गलती क्या है जो मज़दूर हूँ मैं
हाँ साहेब मज़दूर हूँ मैं

©प्रभाकर “प्रभू” – Writer, Poet, Actor

#petry #कविता #poet #kavyamanjari

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग – फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है

तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए

जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

पुस्तक : Nuskha Hai Wafa (पृष्ठ 61)undefined


Disclaimer : ये नज़्म भारतीय काव्य की सार्वभौमिकता को एक जगह संकलित करने के उद्देश्य से विशुद्ध अव्यावसायिक रूप मे यहाँ प्रस्तुत किया गया है

सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना – पाश

क्या आप #पाश को जानते हैं ! हाँ “अवतार सिंह संधू” इनका पूरा नाम यही है। इनकी हर लिखी पक्ति आज भी शूलगता हुआ शोला है। आज दुनियाँ जैसे भी उन्हे याद रखे पर उनकी रचित हर कविता मे सच्चाई की एक भीषण गंध है जोआपके अंतर्मन को झकझोर कर रख देती है।

आज पाश को जिस भी पक्ष से आप देख लें पर उनकी सारगर्भिता आप झूठला नहीं सकते। उनकी बेहद तल्ख और धारदार पंक्तियाँ पिघले लोहे की भांति आपके हर शय को चीरती हुयी आपके अंतर्मन में लहूलुहान हो चुके हर अनुभति को शब्दों दे देती है। शायद यही कारण है की आज भी उनकी कविता उतनी हीं रेलवन्ट मालूम पड़ती है जितनी कभी वो अपने दौर मे थी।

पाश हमे अक्सर आगाह करते रहे हैं साथ मे प्रेरित भी करते हैं कि आप जिस भी स्थिति मे हों उसे बेहतर करने की जद्दोजहद करते राहनी चाहिए। उनकी रचित एक बेहद लोकप्रिय कविता “मेहनत की लूट” चाहे जिस भी परिस्थिति मे लिखी गई हो पर आज भी उतना ही प्रासांगिक है । हर शब्द वेदना और विद्रोह की भीषण गंध लिए आपको प्रेरित करती है और बेहतर सपने देखने की हिम्मत देती है।

याद रहे, बेहतर कल का निर्माण आज के बेहतर सपनों से होती है और बेहतर आज के लिए अथक परिश्रम की जरूरत है। जरूरी नहीं कि हमारे सपने राजनीति के तराजू पे तौले जाएं और लेफ्ट और राइट विंग के चक्कर मे यूं हीं दम तोड़ दे। हम अक्सर समाज मे बदलाव के लिए आवाज उठाने की खोखली कोशिश करते रहते हैं पर शायद खूद के खोंखलेपन के वजह से किसी दूसरों के अजेंडा का एक मोहरा बन कर रह जाते हैं।

हमारी सफलता-असफलता के लिए हमसे ज्यादा कोई और जिम्मेदार नहीं हो सकता। हमने सपने देखना छोड़ दिया है। जो बहुमूल्य प्रयास पहले हमारे खूबसूरत कल के लिए होना चाहिए वो न जाने क्यों बिखर सा गया है … हमारे सपने मर से गए है और ये सबसे खतरनाक है

मेहनत की लूट कविता अपनी श्याह पक्ष के साथ भी आज की प्रासंगिकता में उतनी ही सार्थक है.

Continue reading “सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना – पाश”

लाज़बाब

फ़ितरत किसी की ना
आज़माया कर
ऐ दोस्त…
हर शख्स़ अपनी
हद में बेहद
लाज़बाब होता है…

माँ तुझे भेंट करेंगे ये आज़ादी

माँ तुझे भेंट करेंगे ये आज़ादी 
इस 70वीं साल की आज़ादी 
हमें देनी है आज़ादी 
इस गन्दगी से आजादी 
इस बंदगी से आज़ादी 
हर नफरतों से आज़ादी 
दकियानूसी सोचों से आजादी 
आरामतलबी से आज़ादी 
छोटी सोच से आज़ादी 
लाल फीताशाही से आज़ादी 
झूठे वादों से आज़ादी 
कर्तव्यहीनता से आज़ादी 
कृतघ्नता से आज़ादी 
हम छीन के देंगे आजादी 
भारत माँ को आज़ादी 
हर बाधाओं से आज़ादी 
हर रुकावटो से आज़ादी 
टूटे हौसला से आजादी 
बस बहुत जी ली हमने आज़ादी 
माँ अब तुझे देंगे ये आज़ादी।।
by 
शशि कुमार

माँ तुझे भेंट करेंगे ये आज़ादी.jpg

The Declaration : The Poem…Read it, Study it, Recite it and then Live it

The Declaration

image

Today I declare that my past will no longer limit my future and just because I couldn’t achieve something yesterday doesn’t mean I won’t do it this day.

Today I declare that I’ll honor my talents, express my gifts and reveal my creativity to everyone around me.

Today, I declare I’ll be loyal to my values, respectful of my mission and fiercely focused on my dreams.

Today, I declare that I am a maker versus a consumer, a giver versus a taker and a visionary versus a victim.

Today, I declare that I will always be part of the solution and never part of the problem.

Today, I declare that when I fall, I will certainly rise and when I’m in doubt, I will persist.

Today, I declare that I will cherish my health, feed my mind and nourish my soul.

Today, I declare that I am surrounding myself with people who are smarter, faster, stronger and better than me so I am uplifted by their models and inspired by their examples.

Today, I declare that I set the standard in my work, am becoming the icon of my industry and a legend at my craft.

Today, I declare that I adore my family, am grateful for my friends and am an encourager to all those who are blessed to cross my path.

Today, I declare that this New Year is MY year. My time to grow, excel, laugh, love, win, believe, persevere and serve, knowing that I am truly the leader of my fate, the owner of my results and the hero of my destiny.

Today, I declare I am strong and brave, not timid nor weak

The poem…read it, study it, recite it and then live it… 

May this to be YOUR year, the year you step into your truest power, own your highest talents and create results that are nothing less than monumental.

A Poem by Robin Sharma
#1 bestselling author of The Leader Who Had No Title

Posted from WordPress for Android By Shashi Kumar Aansoo